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सस्ता खरीदकर व्यापारियों ने की जमाखोरी भावांतर खत्म होते ही बढ़ा दिए उपज के दाम

भावांतर का पहला चरण खत्म होते ही योजना में शामिल कृषि उपज के दाम अप्रत्याशित ढंग से बढ़ रहे हैं।

Danik Bhaskar | Jan 10, 2018, 05:42 AM IST

भोपाल . भावांतर का पहला चरण खत्म होते ही योजना में शामिल कृषि उपज के दाम अप्रत्याशित ढंग से बढ़ रहे हैं। योजना के पहले चरण की खरीदी 31 दिसंबर-17 को बंद हुई थी। इसके बाद महज सात दिन में ही सभी अनाजों के दामों में 150 से 500 रुपए तक बढ़ गए हैं। तर्क दिया जा रहा है कि मंडियों में आवक घट गई है। इसलिए दाम बढ़ गए हैं। सूत्रों के मुताबिक व्यापारियों ने भावांतर की आड़ में सस्ते दामों पर अनाज खरीदकर जमाखोरी की है। जिसे वे मनचाहे दामों पर बेच रहे हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि किसानों के लिए चलाई गई यह दूसरी योजना है जिसका असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। इससे पहले सरकार ने किसानों को उचित मूल्य देने के लिए प्याज खरीदकर गोदामों में सड़ा दी थी। बाद में प्याज के दाम 50 रुपए किलो तक पहुंच गए थे। अब तक बाजार में दालों के दामों में 3 से 5 रुपए की तेजी आ चुकी है।

व्यापारियों ने ऐसे उठाया फायदा

- किसान भागीरथ पाटीदार ने बताया कि भावांतर में रजिस्टर्ड किसानों को व्यापारियों ने यह कर कम से कम दाम पर उपज बेचने के लिए मना लिया कि उन्हें शेष पैसा भावांतर में मिल ही जाएगा। हालांकि राज्य सरकार ने अपने प्रेजेंटेशन में कहा था कि पूरे देश में एक से भाव हैं। ऐसे में भावांतर के नाम पर दाम जानबूझकर नहीं घटाए गए।

- मंडी में 150-500 रुपए तक की तेजी आ गई है, क्योंकि किसानों की आवक घट गई है। सारा माल व्यापारियों के पास स्टॉक है। आखिर वे दो पैसे कमाने के लिए धंधा करते हैं। दालों में विदेशों से होने वाले आयात के कारण लंबी तेजी न दिखे, लेकिन सोयाबीन में आने वाले दिनों में 500 रुपए की तेजी आ सकती है। इस समय सोयाबीन के रेट ही 3300 रुपए चल रहे हैं।

-संजीव जैन, प्रवक्ता, करोंद मंडी व्यापारी एसोसिएशन

- हमारे सोयाबीन के रेट भावांतर के दौरान महाराष्ट्र और कर्नाटक के जितने ही रहे। सायोबीन का आज भी वेटेड एवरेज रेट 2850 रुपए ही है। 31 दिसंबर के पहले भी यही था। ऐसे में यह कहना ठीक नहीं कि भावांतर के कारण दाम कम थे और उसके बाद एकदम से बढ़ गए।
- राजेश राजौरा, प्रमुख सचिव, कृषि विभाग, मप्र

- भावांतर योजना में सुधार की जरूरत है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि मॉडल रेट से कम दाम पर कोई व्यापारी माल खरीद नहीं पाए। अनाज की ग्रेडिंग हो। निचली ग्रेडिंग वाली कृषि उपज को सरकार खरीदे। सेब में यह होता है। इसी के चलते व्यापारी कर्टल बनाकर दाम घटा देते हैं। बाद में एकदम से बढ़ा देते हैं। अभी मॉडल रेट बाजार तय करता है। यह मॉडल रेट सरकार को तय करना चाहिए।

- देवेंदर शर्मा, कृषि विशेषज्ञ