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एक रात में बनकर तैयार हुआ था ये मंदिर, गुंबद के नीचे हर खंड में दिखता है नक्शा

प्राचीन मंदिर की दीवारों पर नीचे से लेकर ऊपर तक हिंदू देवी-देवताओं के चित्र उकेरे गए हैं।

Bhaskar News | Last Modified - Feb 13, 2018, 12:39 AM IST

  • एक रात में बनकर तैयार हुआ था ये मंदिर, गुंबद के नीचे हर खंड में दिखता है नक्शा
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    प्राचीन मंदिर की दीवारों पर नीचे से लेकर ऊपर तक हिंदू देवी-देवताओं के चित्र उकेरे गए हैं।

    गंजबासौदा (भोपाल). राजधानी भोपाल से लगभग 120 किलोमीटर दूर बसा शिवजी का मंदिर है। यह उदयपुर का नीलकंठेश्वर महादेव के नाम से फेमस है। इसका निर्माण दसवीं शताब्दी में राजा भोज के भतीजे उदयादित्य ने विक्रम संवत् 1116 से 1137 के मध्य कराया था। लगातार बदलती भाषाओं के कारण अब उदयपुर कहा जाने लगा। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि, सूरज की सीधे रोशनी गर्भगृह में रखे शिवलिंग तक पहुंचती है। रोजाना यहां शिवलिंग का किरणाभिषेक होता है। बताया जाता है ये मंदिर एक रात में बनाया गया था। 51 फीट है ऊंचाई...

    - पत्थर परकोटे के बीच सुरक्षित इस मंदिर की ऊंचाई 51 फीट है इसकी दीवारों में नीचे से ऊपर तक जो नक्काशी है उनमें हिंदू-देवी-देवताओं के चित्र बने हुए हैं।

    - नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर प्रदेश के वर्ल्ड फेमस खजुराहो मंदिर की श्रेणी में आता है । मंदिर का नक्शा हर खंड पर बना है।

    - पत्थरों पर तराशे गए इन छोटे-छोटे खंडों को जोड़कर मंदिर का गर्भगृह बनाया गया है।

    - गुंबद के नीचे लगे हर खंड में मंदिर का पूरा नक्शा अंकित दिखाई देता है। इससे सहज ही अंदाजा लग जाता है कि मंदिर जमीन से कितना ऊपर और कितना नीचे है।

    गर्भ गृह के बाहर खंभों पर खजुराहो जैसी शिल्प
    - नीलकंठ महादेव मंदिर में गर्भगृह से बाहर स्तंभों पर खजुराहो की तरह कामसूत्र का चित्रण किया गया हैं।

    - मध्यकाल में लोग बड़ी संख्या में वैराग्य की ओर आकर्षित हो रहे थे।

    - उस समय देवालयों के माध्यम से उन्हें गृहस्थ जीवन की ओर आकर्षित करने का प्रयास जारी था।

    मंदिर में स्थापित है विशाल शिवलिंग
    - मंदिर में करीब आठ फीट ऊंचा शिवलिंग स्थापित है। वह पीतल के बड़े कवच से ढंका रहता है। कवच को प्रति वर्ष महाशिवरात्रि पर अभिषेक के लिए हटाया जाता है।

    - इस कवच का निर्माण विक्रम संवत 1985 (ईसवी सन् 1929) में आलीजा बहादुर शासनकाल के दौरान ग्वालियर रियासत के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया ने कराया था।

    - उस दौरान मंदिर का जीर्णोद्धार अधीक्षक पुरातत्व विभाग ग्वालियर रियासत की देखरेख में किया गया था।

    प्रथम सूर्य की किरण प्रतिमा पर
    - मंदिर में गर्भगृह का निर्माण इस ढंग से किया गया है कि प्रतिदिन जब सूर्य आसमान में प्रात:काल उदय होता है। सूर्य की प्रथम किरण भगवान शिव की प्रतिमा पर पड़ती है।

    - मंदिर के बाहर पूर्व दिशा में मुख्य द्वार के सामने यज्ञ शाला नक्काशीदार पत्थरों से बनाई गई है। जहां प्राचीनकाल में यज्ञ आदि होते थे।

    शिवलिंग का साइज...

    - 05 फीट 9 इंच शिवलिंग की गोलाई

    - 03 फीट 3 इंच जिलेहरी से ऊपर

    - 06 फीट 7 इंच जमीन से ऊंचाई

    - 22 फीट 4 इंच चौकोर जिलेहरी

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    प्राचीन शक्ति केंद्र है भारती मठ

    प्राचीन शक्ति केंद्र है भारती मठ


    - बेतवा के चरणतीर्थ शिवालयों के पश्चिमी छोर पर स्थित भारती मठ शिवाराधना का शक्ति केंद्र रहा है। यहां स्थित एकांत गुफाओं में विभिन्न सिद्धियां प्राप्त साधु-संन्यासी निरंतर तपस्या करते थे।

    - मंदिर के शीर्ष भाग में स्थापित शिवलिंग की विशेषता है कि रोज सुबह सूर्योदय होते ही सूर्य की पहली किरण शिवजी का अभिषेक करती है। वहीं, नगर के कायस्थपुरा क्षेत्र में स्थित गुप्तेश्वर महादेव मंदिर की गिनती पुराणों में भी भोलेनाथ के उपलिंगों के रूप में की जाती है। 1700 साल पुराना, काले पत्थर से बना यह शिवलिंग उत्तराभिमुख है।

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    रामेश्वर गोपेश्वर महेश्वर महादेव

    रामेश्वर गोपेश्वर महेश्वर महादेव
    - वैत्रवती के चरणतीर्थ घाट के पास रामेश्वर गोपेश्वर महेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। जिसका कलश 80 फीट ऊंचा है।

    - इस मंदिर का निर्माण पेशवा के सूबेदार अप्पाजी खांडे ने सन 1735 में शुरू किया जो 1772 में पूरा हुआ। काले पाषाण से बने शिवलिंग की ऊंचाई दो फीट, चौड़ाई तीन फीट तथा लंबाई साढ़े चार फीट लंबी है। मंदिर का निर्माण उदयगिरि पहाड़ी के पत्थरों से किया गया था।

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    सिरोंज के कार्तिक घाट पर स्थापित हैॆ 12 ज्योतिर्लिंग

    सिरोंज के कार्तिक घाट पर स्थापित हैॆ 12 ज्योतिर्लिंग
    - केथन नदी के किनारे बने कार्तिक घाट पर छोटे तथा बड़े 12 ज्योतिर्लिंग के प्रतिरूप स्थापित हैं। ये सभी ज्योतिर्लिंग देश भर में स्थापित ज्योतिर्लिंग के प्रतिनिधि के रूप में सैकड़ों साल पहले स्थापित किए गए हैं।

    - इन शिवलिंगों का निर्माण उसी प्रकार किया गया है जैसे वह अपने मूल स्थान पर स्थापित है। इन शिवलिंगों की वर्ष भर पूजा अर्चना की जाती है। श्रावण, कार्तिक मास तथा महाशिवरात्रि पर विशेष पूजा अर्चना की जाती है। इन दिनों श्रद्धालुओं की काफी भीड़ रहती है।

    देवपुर का बाबा विश्वनाथ मंदिर
    - देवपुर को 64 तीर्थों का गुरु माना जाता है। पद्मपुराण में भी इसका उल्लेख है। प्राचीन मंदिर में शिवलिंग के समीप ही एक पाषाण का शीश भी स्थापित है।

    - मान्यता है कि यह शीश राजा वीरमणि का है। बाबा के दरबार में प्राचीन जलकुंड भी है। जिसमें शुद्ध जल का प्रवाह निरंतर बना रहता है।

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