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##GasTragedy: हमें 5 घंटे में करना था दो लाख लोगों की दवा का इंतजाम..

लोगों को समय रहते पता होता कि वे यहां-वहां भागने के बजाय अपने घर में रहें तो बड़े पैमाने पर नुकसान होने से बचाया जा सकता।

Bhaskar News| Last Modified - Dec 03, 2017, 05:22 AM IST

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We had to take medicines of two lakh people

भोपाल. डॉ. मिश्रा हादसे के वक्त जीएमसी के डीन रहे दैनिक भास्कर को भोपाल गैस त्रासदी के खौफनाक मंजर को याद करते हुए बताया कि,  दिसंबर 1984 की उस सर्द रात मैं तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री रेवानाथ चौरे के साथ था। यूनियन कार्बाइड प्लांट से गैस लीक होने की खबर मिल चुकी थी। मैंने तत्काल पता लगाने की कोशिश की कि गैस की प्रकृति कैसी है। क्या स्थितियां पैदा हो सकती हैं। कार्बाइड के अधिकारियों ने मुझे बताया कि लीक हो रही गैस पानी में घुलनशील है। उनकी सलाह थी कि लोग चेहरे पर गीला कपड़ा रखें। इससे आंखों में जलन पैदा कर रही गैस हवा के साथ शरीर के भीतर नहीं जाएगी। उनका यह भी दावा था कि यह गैस कोई गंभीर दुष्प्रभाव नहीं छोड़ेगी। यह दावा बाद में पूरी तरह गलत निकला। हमने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आॅक्यूपेशनल हेल्थ और मेडिलर्स (वाशिंगटन) जैसे वैज्ञानिक संगठनों से संपर्क साधा। वे तक यह नहीं जानते थे कि लीक हो रही गैस कितनी जहरीली है और कौन सी दवा इसके लिए कारगर है। यह जवाब हमारे लिए चेतावनी था कि हम कितने गंभीर हालात में हैं। 

 

- अगर लोगों को समय रहते पता होता कि वे यहां-वहां भागने के बजाय अपने घर में रहें तो बड़े पैमाने पर नुकसान होने से बचाया जा सकता था।

- चिकित्सा पेशे से जुड़े लोगोें के लिए कठिन परीक्षा की घड़ी थी। मैं उस समय मेडिकल कॉलेज का डीन था।

- मेरी जिम्मेदारी थी-चिकित्सा व्यवस्था। मैंने सुपरिंटेंडेंट एनआर भंडारी के साथ मिलकर बिना रुके घंटों तक काम किया।

- मेरा अनुमान था कि शहर से भागे लोगों के वापस आने के बाद सुबह की शिफ्ट में करीब दो लाख लोग इलाज के लिए पहुंच सकते हैं। केवल 5 घंटे का वक्त था। हमारी बड़ी जरूरत थी-बड़ी मात्रा में दवाएं जुटाना।

- हमने सबसे पहले जरूरी दवाओं की सूची तैयार की। इसके बाद स्थानीय विक्रेताओं से दवाओं का पूरा स्टॉक पहुंचाने को कहा। उन्होंने बिना देर किए दवाएं दी।

- मैंने इंदौर व ग्वालियर मेडिकल कॉलेज के डीन से ज्यादा से ज्यादा मात्रा में दवाएं विमान से भोपाल पहुंचाने को कहा। सुबह दवाओं के साथ मेडिकल स्टॉफ भी आ गया।

- स्वास्थ्य मंत्री अस्पताल में साथ थे। उन्होंने मुझे सभी पड़ोसी राज्यों के सिविल सर्जंस से संपर्क करने की इजाजत दी।

- सुबह तक दवाओं की करीब दो लाख पुड़ियां तैयार थी। सारा स्टाफ बुलाया। राहत कैंप खोले। रिकॉर्ड के लिए रजिस्टर रखे।

- अगली समस्या थी अस्पताल में भर्ती गंभीर लोगों का इलाज। केवल 800 बिस्तर थे। पहले से भर्ती जिन मरीजों को डिस्चार्ज कर सकते थे, हमने उनसे तत्काल अस्पताल छोड़ने को कहा।

- इसके बाद भी 700 बिस्तर ही मिले। हमने वार्ड और वार्ड के चारों तरफ अतिरिक्त जगह बनाई। जमीन पर गद्दे डालकर अस्थाई वार्ड तैयार किए।

- गलियारों को भी अस्थाई वार्ड में बदला। एक हफ्ते तक ऐसे इंतजामों से पौने दो लाख लोगों का इलाज हुआ, दस हजार से ज्यादा पीड़ित भर्ती कर पाए।  

 

एक हफ्ते तक ऐसे इंतजामों से पौने दो लाख लोगों का इलाज हुआ, दस 
- हजार से ज्यादा पीड़ित भर्ती कर पाए। यह पूरे मेडिकल क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। 12 अप्रैल 1985 को अमेरिका के प्रसिद्ध जर्नल ऑफ अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जामा) में जेपी कपलान ने इस प्रयास को बेहद असाधारण बहादुरी वाला बताया। 

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