स्टोरी 1 : 27 फरवरी को रात 9 बजे मध्यप्रदेश के सतना से 25 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव चुराट्‌टा के निवासी शोभनाथ तिवारी...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 02:20 AM IST

 
स्टोरी 1 : 27 फरवरी को रात 9 बजे मध्यप्रदेश के सतना से 25 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव चुराट्‌टा के निवासी शोभनाथ तिवारी भोपाल में अपनी नई स्विफ्ट कार की डिलिवरी ले रहे थे।

बड़े किसान परिवार के तिवारी सूखे के कारण उत्पन्न जोखिम को कम करने के लिए 2001 से भोपाल स्थित एक निजी कंपनी में काम कर रहे हैं। वहां उन्होंने टुरिस्ट कार बिज़नेस सीखा और कुछ साल पहले एक वाहन खरीदा। चूंकि पहली कार ने ठीक-ठाक फायदा दिया तो उन्होंने बिज़नेस बढ़ाना चाहा और इस मंगलवार दूसरी कार खरीदी। जब कार उनको डिलिवर की जा रही थी तो उन्हें एक ग्राहक को बुधवार की सुबह 6 बजे भोपाल एयरपोर्ट पर छोड़ने की रिक्वेस्ट मिली। वे नया वाहन बुधवार को एक अन्य ड्राइवर को सौंपने वाले थे पर वे तत्काल मान गए, क्योंकि उन्होंने इसे अपने लिए ‘शगुन कॉल’ माना। इस तरह उनसे बुधवार को मेरी मुलाकात हुई, जब वे अपनी नई कार में शहर के एक होटल से मुझे लेने आए। बीस मिनट की हमारी बातचीत उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को छूती रही पर उसमें उनका 16 वर्षीय बेटा रिशु तिवारी तो मेरा हीरो बन गया, क्यों उसने कभी अपने पिताजी की किसी कार को न तो हाथ लगाया और न उनमें यात्रा की, जो उसकी उम्र में किसी भी किशोर की हसरत होती है। रिशु अपने परिवार की पहली पीढ़ी का सदस्य था जो ‘मदर टेरेसा इंग्लिश मीडियम स्कूल’ में पढ़ता है और पिछले साल एसएससी की परीक्षा में उसने 96 फीसदी अंक हासिल किए थे। शोभनाथ का कहना है कि यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि रिशु ऐसी ज़िंदगी जीना पसंद करता है, जिसमें भौतिकतावाद न्यूनतम हो। शोभनाथ की यह स्पष्ट धारणा है कि बच्चे तब मजबूत बनते हैं, जब उनकी ज़िंदगी में लग्ज़री बहुत कम होती है।

स्टोरी 2 : इस हफ्ते भोपाल के निकट एक आयोजन में छोटे से कस्बे बरेली का दो वर्षीय कृष्णा मेरा सबसे कम उम्र का श्रोता था, जो पूरी एकाग्रता से मेरा भाषण सुन रहा था। लेकिन, यह एकाग्रता दो मिनट से भी कम समय तक चली। वह बेचैन होने लगा और फिर धीरे-धीरे उसकी आवाज बढ़ने लगी। मैंने उस बच्चे की मां को इशारे से बताया, ‘जो वह कर रहा है उसे करने दीजिए, मुझे कोई दिक्कत नहीं है।’ लेकिन बच्चे का नटखटपन बढ़ता ही जा रहा था। शर्मिंदगी से बचने के लिए बच्चे की मां ने अपना फोन निकाला और उसे दे दिया और फिर वह फोन से खेलने लगा। छोड़ी खिलखिलाहट के अलावा कृष्णा पूरे कार्यक्रम में शांत रहा।

वह हर गेम खत्म करने में बहुत तेजी दिखा रहा था और हर बार जब वह कोई गेम पूरा कर लेता तो मैं उसका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ते देख सकता था। कई बार गैजेट भिन्न स्क्रीन पर चला गया, क्योंकि वह अचानक किसी अन्य कमांड को छू लेता लेकिन, उसने कभी अपनी मां की मदद नहीं ली। वह अपने गेम में फिर स्क्रीन ले आता। मजे की बात है कि चर्चा इस बात पर चल रही थी कि कैसे एपल के टिम कुक और माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट्स जैसे लोग अमेरिकियों से कह रहे हैं कि उन्हें 14 वर्ष की उम्र तक अपने बच्चों को मोबाइल टेक्नोलॉजी से दूर ही रखना चाहिए और कैसे हम भारतीय बच्चों को जरूरत से ज्यादा मोबाइल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने दे रहे हैं और उनमें इसकी लत लगा रहे हैं। मैं ऐसे कई पालकों को देखता हूं, जो अपने बच्चों को मोबाइल फोन से दुनिया जीतते देखना चाहते हैं! सच कहें तो बच्चा ये भौतिक चीजें नहीं मांग रहा है बल्कि दोष अभिभावकों का है, जो खुद समय न दे पाने की पूर्ति इन गैजेट्स से करने में अपनी सुविधा देख रहे हैं।

फंडा यह है कि  हमारे बच्चों की शुरुआती ज़िंदगी को थोड़ा ब्लैक एंड व्हाइट बनाने में कुछ गलत नहीं है, यदि हम ईमानदारी से चाहते हैं कि उनका भावी जीवन कलरफुल हो।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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