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बंद कर देनी चाहिए कन्यादान व निकाह योजनाएं, क्योंकि महिलाओं की बेहतरी में ये काम की ही नहीं : कमला भसीन

बेटी का जब होगा अपना घर, तो भागे-भागे आएंगे वर। यह कहना है जानी-मानी समाज विज्ञानी और नारीवादी चिंतक कमला भसीन का।...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 04:15 AM IST

बंद कर देनी चाहिए कन्यादान व निकाह योजनाएं, क्योंकि महिलाओं की बेहतरी में ये काम की ही नहीं : कमला भसीन
बेटी का जब होगा अपना घर, तो भागे-भागे आएंगे वर। यह कहना है जानी-मानी समाज विज्ञानी और नारीवादी चिंतक कमला भसीन का। भसीन का कहना है कि मप्र और तमाम राज्यों को कन्यादान, सामूहिक विवाह और निकाह जैसी तमाम योजनाओं को तत्काल बंद कर देना चाहिए, क्योंकि सरकारी बजट खर्च करने के अलावा महिलाओं के उत्थान और बराबरी दिलाने में इनका कोई योगदान नहीं है। इनके स्थान पर लड़की के विवाह पर उसे घरदान जैसी योजना चलाना चाहिए। भसीन ने कहा कि कन्यादान जैसी योजना पितृसत्तात्मक मानसिकता को दर्शती है, जिसमें बेटी को एक वस्तु माना जाता है, और विवाह पर दान के जरिए उसका मालिकाना हक पिता से पति को ट्रांसफर कर दिया जाता है। भसीन यहां महिला सशक्तिकरण विभाग की ओर से संचालित एक ट्रेनिंग प्रोग्राम में भाग लेने आई हैं।

देश की जानी-मानी समाज विज्ञानी और नारीवादी चिंतक कमला भसीन से दैनिक भास्कर की विशेष बातचीत

भसीन का मूल मंत्र...बेटियों का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए माता-पिता को अपनी सोच में ‘सेंस ऑफ फेयरनेस’ लानी होगी

केंद्र और राज्य सरकारों की जेंडर नीति से आप कितनी संतुष्ट हैं?

इस बात में कोई शक नहीं है कि महिलाओं की स्थिति में काफी सुधार आया है। लडाकू विमान उड़ाने से लेकर भारत में आज ऐसी कोई नौकरी नहीं बची है, जिसमें कम से एक या दो महिलाओं ने सफलतापूर्वक उसे करके नहीं दिखा दिया हो, लेकिन लिंगानुपात में लगातार हमारी स्थिति खराब हो रही है। पहली बार राष्ट्रीय आर्थिक सर्वेक्षण में इस पर चिंता जताई जा रही है, मतलब यह विकास पर भी असर डालने लगा है।

आप कहती हैं औरत की आजादी में ही पुरुष की आजादी है, कैसे?

हां मैं बार-बार जोर देकर कहती हूं कि औरत आजाद नहीं होगी तो मर्द कभी आजाद नहीं हो सकता। बेटी के लिए पिता जीवनभर दहेज जुटाने आर्थिक गुलामी सहता है। भाई को डर सताता है कि घर के बाहर गई उसकी बहन के साथ कहीं छेड़छाड़, बलात्कार जैसी घटना न हो जाए। यदि बहन-बेटी असुरक्षित या प्रताड़ित होंगी तो उसका पिता-भाई बिना कष्ट के चैन से कैसे रह सकेगा?

लैंगिग असमानता की ये लडाई आखिर है किसके बीच?

दरअसल यह दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई है, जिसमें एक ओर पितृसत्तात्मक सोच वाले लोग हैं, दूसरी ओर समानतावादी सोच वाले। इनमें मर्द और औरतें दोनों शामिल हैं, लेकिन हमारे संविधान ने समानतावादी सोच को चुना और इस सोच को चुनने वाले महात्मा गांधी, डॉ. आंबेडकर, महात्मा फुले जैसे लोग भी तो पुरुष ही थे।

जेंडर बराबरी को लेकर नई चुनौतियां क्या हैं?

पारंपरिक पितृसत्ता के बजाए आज कैपिटलिस्ट पेट्रियार्ची (पूंजीवादी पितृसत्ता) महिलाओं की बराबरी की बड़ी दुश्मन है। पोनोग्राफी, चाइल्ड पोनोग्राफी, कॉस्मेटिक इंडस्ट्री, विमन ट्रैफिकिंग, फूहड़ विज्ञापन बाजार इसको पढ़ी-लिखी सोसायटी के लोग ही बढ़ा रहे हैं। हजारों करोड़ डालर की इन इंडस्ट्रीज में महिला सिर्फ प्रदर्शन की वस्तु बनकर रह गई है। अफसोस की बात है कि होनहार लड़कियां इसी काम में लगी हैं और ऐसे नंगे नाच को माय च्वाइस का नाम देकर आजादी समझ रही हैं।

Q कौनसा ऐसा तरीका है, जो लैगिंग असमानता को प्रभावी तरीके से दूर कर सकता है?

A ‘न दहेज, न महंगी शादी, बेटी को दे दो संपत्ति आधी’, हमें इस मूल मंत्र को अपनाना होगा। इसके लिए माता-पिता को अपनी सोच में ‘सेंस ऑफ फेयरनेस’ लानी होगी। जब बेटियों को उच्च शिक्षा और संपत्ति दोनों मिलेंगी, तब ही उनमें पुरुषों के बराबर आत्मविश्वास आएगा।

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Web Title: बंद कर देनी चाहिए कन्यादान व निकाह योजनाएं, क्योंकि महिलाओं की बेहतरी में ये काम की ही नहीं : कमला भसीन
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