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फोन पर हुई बातचीत का सिलसिला आखिरी सांस तक चलता रहता है

दुष्यंत कुमार पाण्डुलिपि संग्रहालय में शनिवार को नाटक बादशाहत का खात्मा का मंचन हुअा। तारिक दाद निर्देशित नाटक...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 01, 2018, 04:20 AM IST

फोन पर हुई बातचीत का सिलसिला आखिरी सांस तक चलता रहता है
दुष्यंत कुमार पाण्डुलिपि संग्रहालय में शनिवार को नाटक बादशाहत का खात्मा का मंचन हुअा। तारिक दाद निर्देशित नाटक की प्रस्तुति कोशिश नाट्य संस्था के कलाकारों ने दी। मंचित नाटक सहादत हसन मंटो की रचना पर आधारित था, जिसकी शुरुआत नायक मनमोहन के इश्किया मिजाज और शायराना डायलॉग से होती है। कथानक का ताना बाना उसके प्रेम में धोखा मिलने, तड़पने, जीने की जद्दोजहद को लेकर बुना गया है। बीच-बीच में आज के हालात पर करारी चोट भी की गई है। मनमोहन दोस्त के दफ्तर में रखवाली करने का काम पाता है। जहां पर फोन के जरिए वह एक लड़की से जुड़ता है और यहां से बातचीत का सिलसिला उसकी आखिरी सांस तक चलता है। मनमोहन बहुत हुई गुलामी हुस्न की, यूं हम इश्क के राजा हो चले..., हां जरूर अंजाम भी खूब जानता हूं। जैसे डायलॉग के साथ कहानी आगे बढ़ती है। मनमोहन लड़की से मिलने के सपने देखता है। उसकी तबीयत खराब होती है। तभी उसका दोस्त जाता है। बातचीत का सिलसिला थम गया तो वह परेशान हो जाता है। इसी बीच अचानक फोन पर उसे आवाज सुनाई पड़ती है। मिलने का वायदा करते हुए बोलता है हुस्न की मलिका! मिलूंगा जरूर। बादशाहियत खत्म होती है तो हो जाए। नाटक में अभिनय नितिन तेजराज, शाजिया उस्मानी आदि ने किया।

नाटक में शायराना अंदाज में बोले गए डायलॉग्स पसंद आए

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