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25 साल से संत जी की कुटिया में लग रही परिंदों की पंगत

News - मानवसेवा का संकल्प लेने वालों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है हिरदारामजी की कुटिया। इस कुटिया की पहचान पक्षियों की...

Dainik Bhaskar

Mar 04, 2018, 07:30 AM IST
25 साल से संत जी की कुटिया में लग रही परिंदों की पंगत
मानवसेवा का संकल्प लेने वालों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं है हिरदारामजी की कुटिया। इस कुटिया की पहचान पक्षियों की सेवा के लिए भी होती है। ढाई दशक पहले से यहां अल सुबह परिंदों की पंगत हर रोज हो रही है। सुबह होते ही हजारों पक्षी यहां जुटने लगते हैं। दाना-पानी की उनकी आस यहां पूरी होती है।

संत हिरदारामजी ने कहा था कि मानव सेवा के साथ पशु-पक्षियों की सेवा भी मानव का धर्म है। स्वामीजी के इस संदेश पर संतनगर 25 सालों से चल रहा है। यहां की आधा दर्जन से अधिक बड़ी छतों पर हर रोज दाना-पानी की व्यवस्था संतजी के सेवादार करते हैं। सैकडों पक्षियों की पंगत संतनगर की छतों और कुटिया पर होती है। संतजी के शिष्य सिद्धभाऊ ने बताया कि कुटिया ने बच्चों, बूढ़ों और बीमारों की सेवा का ही पाठ नहीं पढ़ाया, बल्कि पक्षियों की सेवा की राह भी दिखाई है। संत हिरदारामजी ने अपने अनुयायियों से कहा था, पक्षियों के लिए दाना-पानी का इंतजाम करो.. तब से आज तक सेवा का यह सिलसिला जारी है।

संत हिरदारामजी की कुटिया में है हजारों पक्षियों का अपना घर, दाना-पानी मिलने के कारण सुबह से शुरू हो जाता है पक्षियों का कलरव

कुटिया में आते हैं 1000 से ज्यादा पक्षी

मिलता है सेवा का संदेश

संतजी की कुटिया में आने वालों को भी पक्षियों की सेवा का संदेश दिया जाता है। सालों से दिए जा रहे इस संदेश का असर ये हुआ है कि लोग अपने घरों में भी पशु-पक्षियों की सेवा के लिए व्यवस्था कर रहे हैं। खासकर गर्मी के दिनों में पक्षियों के लिए छतों पर दाना-पानी रखते हैं।

पक्षियों के 200 से ज्यादा घर

संतजी की कुटिया में बने एक-एक कक्ष यहां तक कि समाधि स्थल के चारों तरफ भी पक्षियों के लिए उनके घर बने हुए हैं। इनमें 1000 से ज्यादा पक्षी रहते हैं। इन घरों में पक्षियों द्वारा घोंसले के रूप में घास भी बिछा रहता है। जहां ये पक्षी अंडे दिया करते हैं, आजादी से रहते हैं।

पक्षियों की सेवा से एक अच्छे समाज के निर्माण का है लक्ष्य

संतनगर में पक्षियों को दाना-पानी देने के पीछे सेवा का भाव तो है ही, इसके अलावा एक अच्छे समाज के निर्माण का लक्ष्य भी है। सिद्धभाऊ बताते हैं कि बीते एक दशक से स्कूली बच्चों को भी इस कार्य से जोड़ रखा है, जिसके तहत बच्चों को दाना-पानी और पानी के पॉट उपलब्ध कराए जाते हैं। बच्चे जब सुबह उठकर सबसे पहले पक्षियों को दाना-पानी देते हैं, तो उन्हें पक्षियों से प्रेम होने लगता है। इसका नतीजा यह होता है कि भविष्य में ये बच्चे कभी भी पक्षियों को मारने का विचार तक नहीं करते। मांस खाना तो दूर की बात है, इस तरह जब बच्चे शाकाहारी रहकर बड़े होते हैं तो उनके विचार भी अच्छे होते हैं और वे कभी भी गलत रास्तें पर नहीं जाते।

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