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नवाब साहब के दरबारी मंगाते थे होली पर नागचंपा, रजनीगंधा इत्र

वर्ष 1925 का वह दिन हाजी परिवार को आज भी याद है, जब इत्र की दुकान शुरू होते ही नवाब साहब के दरबारियों में शामिल कुछ...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 04, 2018, 07:30 AM IST

वर्ष 1925 का वह दिन हाजी परिवार को आज भी याद है, जब इत्र की दुकान शुरू होते ही नवाब साहब के दरबारियों में शामिल कुछ लोगों का पैगाम आया कि होली के लिए वह इत्र चाहिए, जिसे लगाते ही उन्हें वर्षाें तक होली की याद ताजा बनी रहे।

पुराने शहर का हाजी परिवार इन यादों के कुछ अंश सुनाते हुए बताता है कि वह नागचंपा और रजनीगंधा इत्र के बारे में जानते थे, लेकिन बनाया कभी नहीं था। उस मांग के अनुसार वर्ष 1925 में होली पर नागचंपा व रजनीगंधा का इत्र बनाया और पिछली चार पीढ़ी से इस इत्र को बना रहे हैं और बाजार में हर साल इसकी मांग बढ़ती जा रही है। होली पर इसकी मांग इसलिए बढ़ती है, क्योंकि इसको लगाते ही होली रंग में दोनों इत्र के लगाने से इसकी मनमोहक खुशबू हुरियारों को मदहोश कर देती है। शहर में आज भी कुछ शौकीन ऐसे हैं जो होली ही नहीं यहां के इत्र बारहों महीने लगाते हैं।

भोपाल का मशहूर इत्र के नाम से कायम है पहचान

इत्र को महकाने वाले हाजी रफीक अहमद राजा बताते हैं कि नागचंपा और रजनीगंधा के साथ ही सभी प्रकार के इत्र उनके यहां चार पीढ़ी से बन रहे हैं और लोग इन सभी इत्रों को भोपाल के मशहूर इत्र के नाम से ही जानते हैं। देश के बाहर से इत्र के शौकीन भोपाल आने पर इनके यहां आना नहीं भूलते हैं। शहर वह बाद में घूमते हैं, उसके पहले इत्र का ऑर्डर देकर जाते हैं, जिससे लौटते वक्त तक पैकिंग हो सके। हाजी परिवार के इत्र की मांग ईरान, इराक, दुबई, सउदी अरब के साथ ही सभी खाड़ी देशो में है।

कन्नौज से आता है माल

हाजी रफीक के अनुसार इत्र के लिए कच्चा माल वह कन्नौज से मंगाते हैं। जबकि कई ऐसे इत्र इराक, ईरान से भी मंगाते हैं, जो यहां बन नहीं सकते हैं। देश के बाहर उनका इत्र भेजने का एक मात्र मकसद हिंदुस्तान का नाम रोशन करना है, जो वे लगातार कर रहे हैं।

परदादा ने शुरू किया और अब्बा ने बढ़ाया

हाजी रफीक के अनुसार उनके परदादा और उसके बाद दादा के बनाए गए इत्र की महक पूरे देश में थी। इसके बाद उनके अब्बा स्वर्गीय हाजी मोहम्मद यूनुस ने इस महक को विश्व के कई देशों तक पहुंचाया।

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Web Title: नवाब साहब के दरबारी मंगाते थे होली पर नागचंपा, रजनीगंधा इत्र
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