काश! मंत्रीजी नेत्रहीनों से पहले ही मिल लेते तो वे पुलिस के हाथों पिटने से बच जाते नेत्र हीनों का 47 दिन से...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 01:15 PM IST

काश! मंत्रीजी नेत्रहीनों से पहले ही मिल लेते तो वे पुलिस के हाथों पिटने से बच जाते

नेत्र

हीनों का 47 दिन से जारी आंदोलन खत्म हो गया। अच्छा हुआ। आंदोलन खत्म कराने नौ नेत्रहीनों की पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री से बुधवार को बात कराई गई। इन सभी को सेंट्रल जेल से मंत्री के बंगले तक लाया गया था। ढाई घंटे की बातचीत के बाद मंत्रीजी ने पांच मांगें मान लीं। इसके लिए उन्हें साधुवाद, लेकिन आज जो चर्चा का निर्णय हुआ, वह मंगलवार को भी हो सकता था। अगर ऐसा होता नेत्रहीनों को खाकी का जुल्मी चेहरा तो देखना नहीं पड़ता। शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना भी नहीं उठानी होती, लेकिन क्या कहें। सिस्टम भी नेत्रहीन है..? जवाब शायद हां। ये कोई इल्जाम या तोहमत नहीं। दरअसल, मंगलवार को हक-ओ-इंसाफ की आवाज बुलंद कर रहे दृष्टिहीनों पर खाकी का कहर टूटा। नीलम पार्क में उन पर लाठियां भांजी गईं। दौड़ा-दौड़ाकर पीटा भी। चोटिल हुए नेत्रहीनों की चीखों से भी भोपाल पुलिस का दिल नहीं पसीजा। बर्बरता सिर्फ यहीं नहीं रुकी। आवारा मवेशियों की तरह एक ही वाहन में करीब 80 लोगों को जबरिया तौर पर ठूंस-ठूंसकर बैठाया गया। क्षमता से अधिक संख्या में बैठाए जाने से कुछ ने दम घुटने की शिकायत की और बाहर निकलने की जुगत करने लगे तो दोबारा से उन्हें पीटा गया। ये सब भी प्रशासन और पुलिस के बड़े अफसरों की मौजूदगी में हुआ। इस घटना से खाकी का सच सामने आया है। उसका अमानवीय चेहरा भी दिखाई दिया। प्रतीत होता है कि पुलिस अब संवेदनशील नहीं हैं। होती तो ऐसा नहीं होता। अब ये भी जान लीजिए कि नेत्रहीनों का कुसूर क्या था? मांग तो सिर्फ मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी। ताकि उन्हें वे अपनी 23 सूत्रीय मांग बता सकें। मुलाकात के जरिए वे उन्हें बताना चाहते थे कि कई नेत्रहीन उच्च शिक्षित होने के बावजूद नौकरी से वंचित है। जीवनयापन की खातिर उन्हें रोजगार चाहिए, नेत्रहीनों के लिए प्रदेश में शिक्षा के संसाधन पर्याप्त संख्या में नहीं है, इन्हें बढ़ाया जाए। इसी तरह ब्लॉक से लेकर संभाग मुख्यालय तक हॉस्टल की मांग भी वे अपने लिए कर रहे थे। इन्हीं जरूरतों के लिए वे 47 दिन से वे यहां धरना दे रहे थे। कड़कड़ाती ठंड में। आंदोलन के चलते यहां वे रामधुन गाते-बजाते या अपनी मांग के समर्थन में नारे लगाते। संख्या की दृष्टि से भी 100-150 से ज्यादा नहीं थे। एक बानगी ओर देखिए पुलिस व प्रशासन ने इस मामले में मासूम और मजलूम नेत्रहीनों को दोषी ठहराया है। इनका कहना था कि उनकी मांगें मान ली गई थीं। इसके बावजूद वे आंदोलन जारी रखे हुए थे। हम तो उन्हें समझाने आए तो वे बेकाबू हो गए, लेकिन अफसरों का ये तर्क स्थितियों के आधार पर समझे से परे है। वैसे भी प्रजातंत्र में सबको अपनी मांग रखने और कहने का अधिकार है।

प्रसंगवश: हमारा संविधान अपने सभी नागरिकों के साथ समानता के साथ ही दिव्यांगों समेत एक संयुक्त समाज बनाने पर जोर देता है। अब दिव्यांगों के सामाजिक पुनर्वास पर सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। इनकी योग्यता की पहचान की जा रही है और उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल किए जाने पर भी बल दिया जा रहा है। भारत सरकार ने दिव्यांगों के लिए कानून भी बनाया है। दिव्यांग व्यक्तियों के स्व-रोजगार के लिए राष्ट्रीय अपंग तथा वित्तीय विकास निगम राज्य की एजेंसियों के मार्फत कर्ज भी मुहैया कराता रहा है। सरकारी नौकरियों में भी दिव्यांगों का आरक्षण दिया गया है। Áअलीम बजमी

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