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घुमक्कड़ रहे 'घुमक्कड़', 29 में से 13 करोड़ रुपए खर्च, नहीं दे पाए राेजगार

घुमक्कड़ जातियों के लिए पिछले साल मिले बजट में से 13 करोड़ रुपए खर्च भी हो गए, लेकिन मदद के नाम पर किसी को भी रोजगार नहीं मिला।

Dainik Bhaskar

Feb 18, 2016, 03:51 AM IST
घुमक्कड़ों की हालत में कोई बदल घुमक्कड़ों की हालत में कोई बदल
भोपाल. लोग गांव में हों, शहर में या जंगलों में, सरकार सबके बारे में सोचती है। यहां तक कि उनके बारे में भी, जो घुमक्कड़ हैं या अर्द्ध घुमक्कड़। इनके लिए बाकायदा एक सरकारी विभाग है। नाम गौर से पढ़िए- मप्र विमुक्त, घुमक्कड़, अर्द्ध घुमक्कड़ जनजाति कल्याण विभाग।
51 जातियां इनकी सूची में हैं। ये लिस्ट 1963 से है। न कुछ जुड़ा, न घटा। जिलों में आदिवासी विकास विभाग और एससी एसटी कल्याण विभाग के कर्मचारियों काे जिम्मा दिया है। इन्हें घुमक्कड़ों के लिए कारोबार कराना है, उद्योग लगवाने हैं। मुश्किल यह है कि घुमक्कड़ों को पकड़ें कहां, साल भर में न लोग आए, न मदद दी जा सकी।
दस हजार में दो बकरी भी नहीं मिलेंगी
हाल ही में विभाग ने 10 हजार रुपए की मदद का एलान किया है। इस रकम से उद्योग लगवाने हैं। एक हितग्राही ने कहा- दस हजार में दो बकरी भी नहीं मिलेंगी। उद्योग क्या खाक खुलेगा? मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इनकी पंचायत बुला चुके हैं। बड़ी समस्या यही है कि घुमंतुओं की संख्या का विभाग के पास कोई आंकड़ा तक नहीं है। लालबत्ती धारण करने के लिए एक वि.घु.अ. जाति अभिकरण जरूर बना।
सही संख्या पता नहीं
इसके चेयरमैन रहे नारायण सिंह बंजारा का दावा है- प्रदेश में 51 जातियों के लगभग एक करोड़ लोग हैं। उनके दावे का आधार उनके अपने संगठन का सर्वे है। जबकि सरकार ने ऐसा कोई सर्वे नहीं कराया। विभाग के डायरेक्टर राकेश अग्रवाल मानते हैं कि सर्वे नहीं हुआ। इसलिए सही संख्या पता नहीं है। ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट को इस काम के बारे में लिखा गया, लेकिन कुछ हुआ नहीं। हितग्राही नहीं मिल पाने का एक बड़ा कारण भी यही है।'
फैक्ट फाइल
1931 में हुआ था सर्वे
1963 में बनी थी लिस्ट
ये जातियां घुमक्कड़
बलदिया, भाट, बाछोवालिया, देसर, लोहार पिट्‌टा, काशी कापड़ी आदि। विमुक्त, कंजर, सांसी, बांछड़ा, मोघिया, नट, पारधी, बेड़िया, कुचबंदिया, पासी, बैरागी आदि।
यहां ज्यादा आबादी
सिवनी, बालाघाट, देवास, मंडला, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, नीमच, मंदसौर, बड़वानी, खंडवा, दमोह, रायसेन, विदिशा, ग्वालियर।
बातें बड़ी-बड़ी, मगर जमीन पर क्या फायदा मिला
अनंत सिंह: मंडला के भीमडोंगरी गांव के निवासी। बकरी पालन के लिए 50 हजार का लोन लिया था। अभी 22 बकरी हैं। साल में 60-70 हजार की बचत होती है।
झामा सिंह: नायक नरसिंहपुर में बकरी पालन शुरू किया। लोन चुका दिया। बकरों की अच्छी मांग रहती है।
सौदान सिंह: शमशाबाद में लोहे के औजार की मशीनें लगाईं। परिवार में अब 5 दुकानें हैं। कुछ और लोग लोन लेना चाहते हैं लेकिन नियम सख्त हैं। अब नहीं मिल रहा।
ऐसे तो विभाग बंद ही हो जाएगा
बैरसिया में एक हॉस्टल खुला है, जो हाउसफुल है। पूरे प्रदेश में एेसे 120 होस्टल हैं। वर्ष 2014-2015 में 29 करोड़ रुपए मिले थे। इसमें से 13 करोड़ खर्च हुए। औसत एक करोड़ से ज्यादा हर महीने। 3.5 करोड़ से ज्यादा वेतन-भत्तों पर। प्रशिक्षण स्वरोजगार पर दो साल में कोई खर्च नहीं। विभाग के पास विजन है, लेकिन 10 हजार रुपए में उद्योग लगाने का। बंजारा दुखी हैं कि अफसरों के भरोसे इस तरह रहे तो विभाग बंद हो जाएगा। सहायक आयुक्त नरेंद्र कुमार अवस्थी भी बेसलाइन सर्वे नहीं होने की समस्या बताते हैं।
इनके बारे में पता कुछ नहीं
घुमंतू जातियों पर 1931 में सर्वे हुआ था। उसके बाद कुछ पता नहीं। एक-डेढ़ साल पहले अफसरों ने सर्वे के लिए बैठक की थी। हमने ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट से कराने को कहा था। घुमंतु जातियों के बारे में ताजे सर्वे के बगैर कहना मुश्किल है कि ये तादाद में कितने हैं, कहां हैं, किस हाल में हैं और इनकी जरूरतें क्या हैं?
एसएन चौधरी, समाजशास्त्री डायरेक्टर, राजीव गांधी चेयर, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल
काम ऐसे करेंगे कि पूरा बजट खर्च हो
विभाग का काम अव्यवस्थित है। अमला नहीं है। मुख्यमंत्रीजी से बात हुई है। अप्रैल में पंचायत बुलाई जा रही है। हम काम ऐसे करेंगे ताकि अप्रैल तक बजट का पूरा उपयोग हो।
अंतर सिंह आर्य, मंत्री, विमुक्त, घुमक्कड़ एवं अर्द्ध घुमक्कड़ जनजाति कल्याण विभाग
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