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12 साल की प्रेग्नेंट बच्ची की बहन ने बाताया ये सब, पिता से मिले हुए 2 साल

हीं बच्ची की बड़ी बहन शुक्रवार को भोपाल आई थी। दैनिक भास्कर ने बड़ी बहन से बात की तो उसने बच्ची का नाम छुटकी बताया।

Bhaskar News | Last Modified - Nov 11, 2017, 12:28 AM IST

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    भोपाल (मध्यप्रदेश) . राजधानी के सरकारी हॉस्पिटल में एडमिट 12 साल की प्रेग्नेंट बच्ची के पिता और उसके साथ ज्यादती करने वाले आरोपियों का पता नहीं चल पाया है। वहीं बच्ची की बड़ी बहन शुक्रवार को भोपाल आई थी। दैनिक भास्कर ने बड़ी बहन से बात की तो उसने बच्ची का नाम छुटकी बताया। बड़ी बहन के मुताबिक, बचपन से ही वे दर-बदर भटक रहे हैं। कई महीनों से भोपाल रेलवे स्टेशन के आसपास ही रह रही थी। छुटकी चार भाई-बहनों में सबसे छोटी है। छुटकी का परिवार जबलपुर का रहने वाला है। अभी भी पुलिस कर रही आरोपियों की तलाश,

    - पुलिस अभी तक इस मामले में आरोपियों की तलाश कर रही है। लेकिन अब तक कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है।
    - पुलिस गुरुवार-शुक्रवार की रात भी उनकी तलाश करती रही , लेकिन अब तक किसी का पता नहीं चल पाया है।
    - पुलिस को इस मामले में अब भी सलमान भेड़ा, राजेश टकला और मनीष की तलाश है। पुलिस को तो यह भी नहीं मालूम की आरोपी बालिग हैं या नाबालिग।
    बच्ची ने गलत पता बताया
    - डीएसपी के मुताबिक, बच्ची से ज्यादा पूछताछ नहीं हो पाई है। उसने जबलपुर का पता बताया था, लेकिन वहां कोई नहीं मिला।
    - अब हम फिर से तलाश कर रहे हैं। मामला जांच में होने के कारण ज्यादा कुछ नहीं बता सकता।
    11 महीने में चाइल्ड लाइन को मिले 294 बच्चे, छुटकी पर नजर नहीं पड़ी
    - दिसंबर 2016 से रेलवे चाइल्ड लाइन ने 11 महीने में 294 बच्चों को आश्रय दिलवाया, लेकिन गैंगरेप की शिकार बच्ची पर कभी किसी की नजर नहीं गई है।
    - वह छह महीने से यहां रह रही थी। ये बात खुद बच्ची और आरोपी सलमान ने पुलिस को पूछताछ में बताया।
    - चाइल्ड लाइन के हाथ लगे बच्चों में करीब 60 परसेंट 12 साल से लेकर 16 साल तक की उम्र के हैं।
    21 बच्चों के नहीं मिले माता-पिता
    - चाइल्ड लाइन ने रेलवे स्टेशन के आसपास अक्टूबर 2017 तक 11 महीने में 294 बच्चों को रेस्क्यू किए गए। यह सभी 18 साल तक के हैं।
    - इसमें से 83 बच्चियों और 190 बालकों को उनके परिवार को सौंपा गया, जबकि 21 बच्चों के अब तक माता-पिता और परिवार का पता नहीं चल सका।
    - 9 बच्चियों को बालिका गृह को सौंपा, जबकि 12 लड़कों को उम्मीद और लोक उत्थान संस्था को दिया गया।
    - मार्च 2017 के बाद उम्मीद संस्था ने बच्चों को रखना बंद कर दिया। अब सिर्फ उत्थान संस्था के पास ही बालकों को भेजता है।

    आगे की स्लाइड्स में इन्फॉग्राफ्स के जरिए पढ़ें, दरबदर परिवार की दर्दनाक दास्तान....
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