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  • Ashutosh Rana said The teachings of the father were recorded in my life as 'silent smile' hit and got the thread of lif

भोपाल / पिता की सिखाई बात मेरे जीवन में मौन मुस्कान की मार के रूप में दर्ज हो गई, यहीं से जीवन का सूत्र मिल गया: आशुतोष



अभिनेता आशुतोष राणा विश्वरंग में भाग लेने भोपाल पहुंचे थे। अभिनेता आशुतोष राणा विश्वरंग में भाग लेने भोपाल पहुंचे थे।
उन्हें सुनने के लिए मिंटो हॉल में भारी संख्या में लोग मौजूद रहे। उन्हें सुनने के लिए मिंटो हॉल में भारी संख्या में लोग मौजूद रहे।
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अभिनेता आशुतोष राणा विश्वरंग में भाग लेने भोपाल पहुंचे थे।अभिनेता आशुतोष राणा विश्वरंग में भाग लेने भोपाल पहुंचे थे।
उन्हें सुनने के लिए मिंटो हॉल में भारी संख्या में लोग मौजूद रहे।उन्हें सुनने के लिए मिंटो हॉल में भारी संख्या में लोग मौजूद रहे।

  • टैगोर अंतरराष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव विश्व रंग के पांचवे दिन मिंटो हॉल में विभिन्न कार्यक्रम हुए
  • इसी मौके पर मुलाकात सत्र में आशुतोष राणा ने अपने पिता की दी हुई सीख पर चर्चा की 

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2019, 02:06 PM IST

भोपाल. 'आशुतोष राणा को जीवन और कला के रंगमंच पर देखते आ रहे हैं, लेकिन कुछ शख्सियत ऐसी भी होती हैं जिन्हें बार-बार देखने और मिलने की इच्छा होती है'... इन्हीं शब्दों के साथ मंच पर आते हैं रंगकर्मी, फिल्म एक्टर आशुतोष राणा और आईसेक्ट के डायरेक्टर सिद्धार्थ चतुर्वेदी और शुरू होता है मुलाकात सत्र।

 

सिद्धार्थ- आशुतोष आपने पुस्तक 'मौन मुस्कान की मार' में व्यंग्य से शुरुआत की, इसमें क्या खास है?
आशुतोष- 'मौन मुस्कान की मार' से शुरुआत हुई क्योंकि मैं गाडरवाड़ा से हूं, जो ग्रामीण अंचल है... वहां बच्चे साक्षर देर से हों, लेकिन शिक्षित बहुत जल्दी हो जाते हैं। वहां स्कूल ही पढ़ाने का काम नहीं करता, गांव भी कहीं न कहीं गुरुमंत्र दे रहा होता है। छोटे में स्कूल से लौटते वक्त मित्र ने मैथिलीशरण गुप्त की कविता- चारू चंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं थी जल थल में... सुनाई, जो गुरु जी ने उस दिन कक्षा में सुनाई थी। हम लोग घाट से उतरते आ रहे थे, स्कूल के बस्ते पीठ पर लटके थे।

 

आशुतोष कहते हैं- हम लोग टेढ़ की घटिया (टेढ का मतलब टेढ़ा, घटिया का मतलब घाटी) से जा रहे थे और कविता पर चर्चा करते जा रहे थे। तभी घाटी पर एक साइकल, जिस पर दो लोग सवार थे, फरफराती हुई आई और फुर्र से दोस्त के पैरों के बीच घुस गई। वो तीनों आम के पेड़ से जा भिड़े। उनके बीच गुत्थम गुत्थी शुरू होगी और अनुप्रास अलंकार भूलकर, अशिष्ट अनुप्रास अलंकार पे उतर आए और मैं गया उन्हें छुड़ाने। जो साइकिल चला रहे थे एक हादसे में उनकी एक आंख चली गई थी। हमारी उम्र के थे। मेरे मित्र ने कहा- कनवा है तो, दिखात काए नही है, साइकिल काए चला रहे? वो बोले- हमरी आंख फूटी तुम्हारे बाप की तो नईं फूटी, हम साइकल चलाएं, चाहे न चलाएं।

 

उस मित्र के पिताजी को गांव के लोग फुर्तीले फूफा कहते थे। लोगों का मानना था कि उनके शरीर में हड्डी नहीं है। उन्हें सुनाई कम देता था यदि कोई चाय कहे तो उन्हें काय सुनाई देता था। माफी कहते थे तो काफी सुनाई देता था। इतने में जिन्होंने साइकिल चढ़ाई थी वो अपने पिता को लेकर वहां आ गया। उनके पिताजी और फुर्तीले फूफा के बीच झगड़ा हो गया। उस लड़के के पापा ने फुर्तीले फूफा से कहा- अपने से लड़के कहो कि वो माफी मांगे। फूफा ने कहा- काफी काए पीहे वो?

 

इतने मेरे पिताजी आए और दोनों को एक एक झापड़ रख दिए और एक शिक्षा दी, वही शिक्षा मेरे जीवन में 'मौन मुस्कान की मार' की यात्रा के रूप में कारगर हुई और जीवन का सूत्र मिल गया।

मेरे पिताजी ने कहा- काने से कनवा कहो, तुरतईं जावै रूठ, अरे हीरै हीरै (धीरे-धीरे) पूछ लो के कैसे गई थी फूट। इसी तरह मेरे घर में शिक्षक आते थे जिनकी दोनों आंखें नहीं थीं। मां ने सिखाया कि उन्हें लुप्त लोचन भगवान कहा करो। वहीं कम सुनने वाले को अल्प श्रुति कहा जाता है।

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