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मध्यप्रदेश को क्या चाहिए / सभी दल चुनावी पत्र में अच्छी शिक्षा, असली शिक्षा की घोषणा करें



assembly election 2018
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assembly election 2018

Dainik Bhaskar

Oct 14, 2018, 11:15 AM IST

(चंद्रकांत राजू प्रख्यात गणितज्ञ, कंप्यूटर साइंटिस्ट)
मध्यप्रदेश में आज भी भूमिहर मजदूरों से लेकर मध्य वर्ग का बड़ा हिस्सा यही मानता है कि अच्छी आजीविका का एक मात्र साधन शिक्षा है। अतः बहुत सारे लोग चाहते हैं कि जो भी सरकार बने, वह उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाए। लेकिन आज की शिक्षा अच्छी शिक्षा नहीं है, क्योंकि इसमें ज्ञान का अभाव है। सर्टिफिकेट और डिग्री बहुतों के पास हैं, लेकिन ज्ञान नहीं। आज कई बच्चे स्कूल के अलावा कोचिंग क्लासेस या प्राइवेट ट्यूशन का सहारा क्यों लेते हैं? किसी भी कोचिंग क्लास में चले जाइए, वहां ठोंक-ठोक कर यह सिखाया जाता है कि उनका लक्ष्य ज्ञान नहीं, केवल परीक्षा पास करना है। लोग कहते हैं कि शिक्षा का स्तर गिर गया है, लेकिन यह कब हुआ? आजादी के पहले या आजादी के बाद? आखिरकार ब्रिटिश हुकूमत के जमाने में आई उपनिवेशवादी शिक्षा ने ही तो सबसे पहले नौकरी को डिग्री से जोड़ा और डिग्री को परीक्षा से जोड़ा। उसके पहले हिन्दुस्तान में न तो डिग्रियां बांटी जाती थीं और न ही डिग्री के सहारे सरकारी नौकरी मिलने की प्रथा थी। 

 

अफसोस की बात यह है कि 130 करोड़ की आबादी वाले हिंदुस्तान में दो सौ साल तक कोई यह बात नहीं समझा कि उपनिवेशवादी शिक्षा पूरी तरह से चर्च की शिक्षा थी। केवल मिशन स्कूल ही नहीं ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसे सभी विश्वविद्यालय चर्च ने ही स्थापित किए (क्रुसेड यानी मजहबी जंग के दौरान मिशनरी बनाने के उद्देश्य से) और सदियों तक उनका पूर्ण नियंत्रण चर्च ने किया। सेकुलर शिक्षा ब्रिटेन में 1870 के बाद आई। हमने चर्च पर अंधविश्वास कर यह मान लिया कि चर्च की शिक्षा ही उत्तम है। यह भी नहीं सोचा कि चर्च की सत्ता अज्ञान पर टिकी है, इसलिए चर्च की शिक्षा का उद्देश्य ही अज्ञान फैलाना है। चर्च ने काम चालाकी से किया, अर्ध ज्ञान और नौकरी का लालच देकर। हम चर्च के इस चक्रव्यूह में फंस गए और आज भी हम दोष कोचिंग क्लास को देते हैं, औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली को नहीं। 

 

आज के समाज में ज्ञान का महत्व बढ़ गया है। अगर पर्याप्त ज्ञान है तो आजीविका कमाने के कई नए तरीके खुल गए हैं। पाठ्यक्रम का नियंत्रण अब भी सरकार के हाथ में है, इसलिए सरकार को नए जमाने के अनुकूल पुराने औपनिवेशवादी पाठ्यक्रम को छोड़कर पाठ्यक्रम को नए सिरे से बनाना चाहिए, जिसमें जोर ज्ञान पर हो न कि याददाश्त पर। सरकार शायद ऐसा न करे, क्योंकि नेताओं और बाबुओं का ध्यान उन्हीं योजनाओं पर केंद्रित रहता है, जिनमें खर्च ज्यादा है। सरकार शायद एक एक्सपर्ट कमेटी बना देगी, लेकिन अगर सरकार केवल पश्चिमी सर्टिफिकेट के आधार पर एक्सपर्ट चयन करेगी तो वही उपनिवेशवादी शिक्षा कायम रहेगी। 

 

इसलिए एक नई तालीम बनाने का काम एकांत में कमेटी द्वारा नहीं हो सकता। इस बात को सार्वजनिक रूप से समझाना होगा कि नई तालीम की व्यावहारिक उपयोगिता क्या है और उसे तैयार करने में कौन-कौन से गैर उपनिवेशवादी विकल्पों का अध्ययन किया है। गैर उपनिवेशवादी शिक्षा के कई मॉडल आज तैयार हैं, गणित और विज्ञान में भी और दुनियाभर में गैर उपनिवेशवादी तालीम की जबरदस्त मांग है। मध्यप्रदेश के लोग जो अच्छी शिक्षा और असली शिक्षा चाहते हैं, उसकी बात सभी दल अपने घोषणा पत्र में करें। 

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