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तीन दशक बाद भी ताजा हैं गैस पीड़ितों के जख्म

तीन दशक बाद भी ताजा हैं गैस पीड़ितों के जख्म

Sushma Barange | Last Modified - Dec 02, 2017, 10:46 AM IST

भोपाल। भोपाल गैस कांड के जख्म तीन दशक बाद भी ताजा है। विश्व की भीषणतम औद्योगिक गैस त्रासदी को 33 वर्ष हो गए, पंद्रह हजार से अधिक लोगों को मौत की नींद सुला देने वाले भोपाल गैस कांड के बारे में बताते हुए आज भी लोगों के दिल दहल जाते हैं और आंखें भर आती हैं। इतने वर्षों बाद भी गैस पीड़ित उचित न्याय और सहायता की आस लगाए बैठे हैं।

-भोपाल में 33 साल पहले 2-3 दिसंबर 1984 को जहरीली गैस रिसाव से हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। जो बच गए वे वर्षों तक उपचार कराते रहे और हजारों कष्टों को सहते हुए किसी तरह जिंदगी गुजारने को विवश हो गए। गैस त्रासदी कितनी भयावह थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गैस प्रभावित कई लोगों के यहां जन्म लेने वाले बच्चे निःशक्तता का दंश झेल रहे हैं।

सरकार ने बंद कर दी पेंशन
गैस पीड़ित भूरी बाई का कहना है कि सरकार की ओर से मिलने वाली पेंशन से किसी तरह गुजारा हो जाया करता था, लेकिन अब तो सरकार ने पेंशन ही बंद कर दी है। सरकार गैस पीड़ितों को केवल धोखा दे रही है। यह गैस पीड़ितों के साथ अन्याय है।

लगा जैसे कोई घर में बम फेंक गया
चिरौंजी ठाकुर का कहना है कि, उस रात हम टीला जमालपुरा में रहा करते थे। उस रात लगभग 8 बजे मेरी आंखों में तेज जलन होने लगी थी। मेरे पति का काम करके आए थे और वह सो रहे थे। मैंने उन्हें उठाया और आंखों की जलन के बारे में बताया, इस उठकर घर का दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खोलते ही पूरा घर भयानक धुएं से भर गया, लगा जैसे किसी ने घर में बम फेंक दिया। बच्चे भी रोने और चिल्लाने लगे। हम घर में ही फंसे रह गए और करीब कई घंटे तक परेशान होते रहे।

लाशों के बीच पड़े थे जिंदा लोग
चिरौंजी ने आगे बताया कि, हम लोग अपने घर से जान बचाने के लिए शाहजहानाबाद इलाके में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के घर गए। उन्होंने फौरन हमें अस्पताल पहुंचाया। हमारी स्थिति यह थी कि हमें हमीदिया अस्पताल में लाशों के बीच पटक दिया गया था। जैसे हम भी लाश बन चुके हो। 3 दिन तक हमारी आंखें बंद रही। न कोई दवाई मिली न ही किसी ने कोई मदद की। गैस त्रासदी का ही अभिशाप है जो उस हादसे के बाद मेरी आंखें चली गई। मेरे पति और दोनों बेटों की भी मौत हो गई।


कुछ ऐसा था मंजर
भोपाल के पुराने वाशिंदे तौफिक सिद्दीकी ने बताया कि, आधी रात को रिसी गैस से सब बदहवास थे। जब घरों से निकले तो लोगों को भगते हुए देखा, सांस लेने में तकलीफ, सीने में जलन और उल्टियां होने लगी थी। कई जगह लाशों का अंबर लगा हुआ था। गैस त्रासदी जिंदगी भर नहीं भूल सकते। अस्पताल और श्मशान घाटों पर लाशों के ढेर पड़े थे, जो जिंदा बच गए वे बार-बार अपनी आंखों को धो रहे थे।

-सालों तक धरना, प्रदर्शन, पैदल मार्च, पुतला दहन, नारेबाजी द्वारा मांगों के लिए संघर्ष करने के बाद भी जब गैस कांड की बरसी आती है तो लोगों का गुस्सा सड़क पर फूट पड़ता है, क्योंकि कई प्रश्नों के उत्तर अभी तक गैस पीड़ितों को नहीं मिले, कई मांगें हैं जो आज तक पूरी नहीं हुईं। गैस कांड का मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन की मौत और बाकी लोगों की रिहाई या सजा के बाद आज भी पीड़ित लोगों को न्याय का इंतजार है।

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Web Title: laashon ke bich pdee the jindaa loga, teen dshk baad bhi taajaa hain gaais piड़iton ke jkhm
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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