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बीजिंग ओलंपिक में खाली हाथ रहने पर मैदान में रो पड़ा था ये ओलंपियन

बीजिंग ओलंपिक में खाली हाथ रहने पर मैदान में रो पड़ा था ये ओलंपियन

Sumit Pandey | Last Modified - Dec 04, 2017, 12:42 PM IST

भोपाल। उनके सितारे बुलंद थे, 2004 में उन्होंने अपनी बंदूक के अचूक निशाना लगाकर देश को सिल्वर मेडल दिलाया था। 2008 बीजिंग ओलंपिक में उनसे गोल्ड की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन उन्होंने बुरी तरह से निराश किया। वह अपनी स्पर्धा डबल ट्रैप के फाइनल राउंड में भी नहीं पहुंच सके थे। उन्हें इसका बेहद दुख हुआ और वह मैदान में ही रो पड़े थे।

-हम बात कर रहे हैं वर्तमान में देश के खेल राज्यमंत्री राज्य वर्धन सिंह राठौड़ की। वह दो दिन के दौरे पर मध्य प्रदेश के सालाना खेल अलंकरण में भाग लेने भोपाल पहुंचे हैं।

-जब एथेंस में राज्य वर्धन ने रजत पदक जीता था, तब पूरे देश को उम्मीद थी कि वे 2008 के बीजिंग ओलंपिक में अपने पदक का रंग बदलेंगे लेकिन हुआ बिलकुल उलटा। बीजिंग में भले राज्‍य वर्धन पीछे रह गए हों, लेकिन सेना के इस निशानेबाज ने एथेंस ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतकर को पदक तालिका में भारत का नाम अंकित कराया था। और भारत के लिए एकमात्र मेडल जीतकर की लाज बचाई थी। इसमें कोई शक नहीं कि 13 साल पहले उनकी इस कामयाबी को पूरे देश ने सलाम किया था।

-2008 के बीजिंग ओलंपिक में राज्य वर्धन सिंह राठौड़ शेरवानी में मार्चपास्ट में भारतीय दल के मुखिया बनकर तिरंगा लेकर चल रहे थे, तब उनके चेहरे पर आत्मविश्वास था और इसी आत्मविश्वास ने उन पर उम्मीदों का बोझ लाद दिया था। शायद इसी बोझ के तले वे इतने दब गए कि फाइनल तक भी नहीं जा सके, जबकि बीजिंग में अभिनव बिंद्रा ने सोने के पदक पर निशाना लगाकर पूरे भारत का दिल जीत लिया।

ऐसे की थी शूटिंग की शुरुआत
-1998 में उन्होंने शूटिंग की शुरुआत की थी। जल्दी वह दुनिया के बेहतरीन ट्रैप शूटरों में गिने जाने लगे। 2003 में साइप्रस के शहर निकोसिया में उन्होंने विश्व चैंपियनशिप का कांस्य जीता था। इसके बाद राठौड़ ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।


लो प्रोफाइल से हाई प्रोफाइल तक
बेहद लो प्रोफाइल शूटर राज्य वर्धन सिंह राठौड़ को एक पदक ने भारत में हाई प्रोफाइल बना दिया। यूं तो खेल जगत में भारत की पहचान चूकने वाले देश के रूप में बन चुकी है। परन्तु मेजर राज्य वर्धन सिंह राठौड़ ने यह साबित कर दिखाया कि उनकी बंदूक से निकली गोलियां चूका नहीं करतीं।

सेना के कर्नल से खेल मंत्री तक
वह तब भी नहीं चूकती थीं जब राठौड़ 1994 से 96 तक कश्मीर के बारामूला और कुपवाड़ा में आतंकवाद की समस्या से लड़ रहे थे और 17 अगस्त, मंगलवार 2004 को भी डबल ट्रैप में राठौड़ की गोलियां नहीं चूकीं। सेना की नौकरी छोड़कर 1998 में खेलों में आए और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज वह देश के खेल राज्य मंत्री हैं।

मां ने चाहा होता तो मप्र के रणजी खिलाड़ी होते राज्य वर्धन
-राठौर को बचपन में चिली के नाम से पुकारा जाता था। क्रिकेट से उनके लगाव की कहानी बेहद दिलचस्प है। दरअसल, राज्य वर्धन की माता चाहती थीं कि वो पढ़-लिख कर बढ़िया नौकरी करें। लेकिन उनका दिल तो क्रिकेट में लगा हुआ था।
-ऐसा नहीं है वो गली क्रिकेट तक ही सीमित रहे बल्कि उनकी प्रतिभा ऐसी थी कि वो 10वीं क्लास में ही मध्यप्रदेश की तरफ से रणजी ट्रॉफी टीम के लिए उनका नाम आगे किया गया था। लेकिन इसके बाद उनकी माता की चाहत ने उन्हें क्रिकेट से वंचित कर दिया।
-उनकी शूटिंग की चाहत तो पूरी दुनिया ने देखी है, लेकिन यह बहुत कम ही लोग जानते हैं कि उनका पहला प्यार शूटिंग नहीं क्रिकेट रहा है। वो एक अव्वल दर्जे के क्रिकेटर भी रह चुके हैं।

8 करोड़ की प्रोपर्टी दिखाई थी
-2014 लोकसभा चुनाव में दौरान राजवर्धन सिंह राठौर ने अपनी कुल संपत्ति 8 करोड़ रुपए दिखाई थी।
-इसके साथ उनके पास दो गाडिय़ां भी दिखाई गई थीं। जिसमें एक 6 लाख तो दूसरी 26 लाख की है।

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