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लचर पुलिसिंग का जीता-जागता सबूत है चोरी हुई कबीटपुरा की पुलिस चौकी

लचर पुलिसिंग का जीता-जागता सबूत है चोरी हुई कबीटपुरा की पुलिस चौकी

Danik Bhaskar | Dec 12, 2017, 05:49 PM IST

भोपालमध्य प्रदेश पुलिस। बेबस, लाचार, मजबूर। ऐसा इसलिए कि पिछले कुछ माह में वर्दीवालों ने समाज के सामने उदाहरण ही ऐसे पेश किए हैं। चाहे रेप पीड़िता को तीन थानों के बीच 24 घंटे भटकाने का मामला हो या फिर झांसे में लेकर महिलाओं का शोषण करने का। इस बार तो लोगों की जान-माल की सुरक्षा करने वाली टीला जमालपुरा थाना पुलिस की कबीटपुरा स्थित चौकी ही चोरी हो गई। हैरानी की बात तो यह है कि पुलिसकर्मियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। भला हो जनता का, जो चौकी चोरी होने की शिकायत सीएम हेल्पलाइन में कर दी। नहीं तो पुलिस को पता ही नहीं चलता कि यहां उनकी कोई चौकी भी थी। चूंकि मामला खुद की संपत्ति की चोरी का था तो चंद ही घंटों में चौकी ढूंढ ली गई। वर्ना तो साहब, यहां लोगों का सामान चोरी हुए बरसों गुजर गए। सामान मिलना तो दूर अब उसके विषय में बात तक करने के लिए थाने में किसी के पास वक्त नहीं है।

-हुजूर एक ओर चौकी की कहानी भी जान लीजिए, भोपाल रेलवे स्टेशन के नजदीक सराय सिकंदरी पुलिस चौकी पर एक बदमाश का 15 साल कब्जा रहा। यह बदमाश चौकी के सामने कुछ ठेले खड़े करवाकर हफ्ता वसूली करता था। इतना ही नहीं हाथठेले वालों का सामान चौकी में रखने तक का किराया वसूलता था। ये चौकी एक हॉल और दो कमरों की शक्ल में थी। हाल ही में बजरिया पुलिस ने उसे खाली कराया है। अंदरखाने की खबरें कहती हैं कि महकमे के ही वर्दीधारियों ने डेढ़ दशक पहले सांठ-गांठ कर बदमाश को चौकी सौंपी थी। बदमाश ने भी पुलिस चौकी का बोर्ड हटाने से लेकर वे सभी सबूत मिटा दिए, जो चौकी होने की गवाही देते थे। हुजूर, यह सिर्फ चौकी नहीं लोगों की सहायता का ऐसा केंद्र है, जो आपात स्थिति में पीड़ितों की मदद कर सके। पुलिस की गलतियों के ऐसे कई स्मारक शहर के अलग-अलग हिस्सों में लावारिस हालत में हैं, जिन्हें हमेशा पुलिसकर्मियों के आने और उसमें कुछ पल बैठने का इंतजार रहता है। चुनिंदा को छोड़कर अमूमन सभी चौकियां महीनों वीरान ही रहती हैं। महकमे के आला अफसरों के पास भी इतना वक्त नहीं कि वे कभी इनकी सुध ले सकें। यह भी एक हकीकत है कि कुछ चौकियों के इर्द-गिर्द अतिक्रमण है तो कुछ बदहाल हैं। कुछ में बिजली नहीं तो कुछ में फर्नीचर की समस्या है। हालांकि शहर के एक-दो स्थानों पर ही वे चौकियां महफूज हैं, जो जनभागीदारी से बनाई गई हैं। इन चौकियों में रिपोर्ट दर्ज करने की व्यवस्था नहीं होने से लोगों को थाने ही जाना पड़ता है। इसकी वजह भी पुलिस की लचर व्यवस्था है।

प्रसंगवश: वर्ष1992 में शहर में हुए दंगों के बाद संवेदनशील इलाकों में चौकियां खोली गई थीं। इलाके के बीट अधिकारी को इसका जिम्मा सौंपा गया था। किसी जमाने में चौकी पर चेतक-चीता का पॉइंट भी होता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। पुलिस चौकियों को खोले जाने का मकसद क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखना था। साथ ही नागरिकों के बीच सक्रिय रहना भी। अभी भोपाल जिले में 31 पुलिस चौकियां और 35 थाने हैं। भोपाल शहर में सबसे पुरानी चौकी तलैया और चौक की है। - अलीम बजमी, न्यूज एडिटर दैनिक भास्कर, भोपाल