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Danik Bhaskar

Dec 08, 2017, 12:21 PM IST

भोपाल। भोपाल नगर निगम परिषद का काम शहरी विकास की अवधारणा को अमली जामा पहनाना। नगरीय विकास की योजनाएं बनाना। नगरीय प्रबंधन को सशक्त करना। लोक कल्याणकारी कार्यों को वरीयता देना। पर्यावरणीय समस्याएं हल करना, लेकिन हुजूर, अफसोस इस जन चौपाल का रूप अब मलिन हो गया। यह कोई इल्जाम नहीं और ही कोई तोहमत। ऐसा कोई इरादा भी नहीं, लेकिन कई उदाहरण बताते हैं कि यहां 412 वर्ग किमी में फैले शहर की आवश्यकताओं पर कभी गंभीरता से चर्चा नहीं हुई। ही जनविकास को लेकर विषयवार कोई सारगर्भित बहस। ऐसा भी नहीं कि अलादीन का चिराग रगड़ने से शहर में कोई करिश्मा हुआ हो, या फिर सारी समस्याएं ही हल हो गईं हों। हुजूर, कई समस्याएं तो बाबा आदम के जमाने की हैं। इनसे हमारे नुमाइंदे वाकिफ भी हैं, लेकिन जन पालिका में व्यक्तिगत लांछन, शोर-शराबा, आरोप-प्रत्यारोप से आगे कुछ दिखाई नहीं देता। हंगामा, नारेबाजी, आसंदी को घेरना और बहिर्गमन ने अब एक संस्कृति का रूप ले लिया है। इस सबके बीच लान-तान तो चलती है, मगर हुजूर ये भी जान लीजिए कि पब्लिक भी सब जानती है। ‘क्लीन भोपाल, ग्रीन भोपाल’ का नारा अब मुंह चिढ़ा रहा है। देश के दूसरे स्वच्छ शहर का दर्जा पाने के बाद अब ये जान लीजिए कि केंद्र के नए प्रावधानों के बाद आप दूसरे पायदान से सरकने वाले हैं, क्योंकि सीवेज मामले में भोपाल अन्य शहरों की तुलना में बहुत पीछे है। प्लीज, इंदौर से सबक लें, पहले नंबर की अपनी पोजिशन को कायम रखने वह कितनी मशक्कत कर रहा है।

शहर में अब भी पांच फीसदी से कुछ ज्यादा आबादी भू-जल स्त्रोतों पर निर्भर है, जबकि शहर में बड़े तालाब, कोलार के अलावा अब नर्मदा का जल भी चुका है। माय बस तो चला दी, लेकिन व्यवहारिक स्थिति देखे बगैर रूट तय कर दिए। परिवहन का यह साधन पब्लिक के लिए मुफीद नहीं रहा। जापानी साइकिलों ने भी आपकी फजीहत कराई है। राहगीरी तो बंद करना पड़ी। नगर नियोजन की दृष्टि से अब व्यस्ततम इलाकों में ग्रेट सेपेरेटर, फ्लाई ओवर और सब-वे की जरूरत है, लेकिन इसको लेकर जनपालिका में कोई हलचल होने से हैरत होती है। सिर्फ इतना ही नहीं भविष्य की आवश्यकताओं के आकलन के लिए अब तक जोनल प्लान ही नहीं बना। पेयजल वितरण व्यवस्था को लेकर हमेशा से हाय-तौबा है तो बाजारों को अतिक्रमण से मुक्त कराने के मामले में सुस्ती दागदार बताती है। मल्टी लेवल पार्किंग की योजना भी अब तक अमल में नहीं आने से न्यू मार्केट की फोर लेन अब टू लेन में दिखाई देती है। अंदरखाने की आवाजों से भी शहर खूब वाकिफ है। नुमाइंदे बने हैं तो हक अदा कीजिए। व्यक्तिगत मांग और सुविधाओं की फेहरिस्त से बाज आएं ताकि लोग आपकी तारीफ करें। आदर्श नुमाइंदे के तौर पर याद रखें।

प्रसंगवश: 1983में गठित परिषद के कार्यकाल में भोपाल गैस त्रासदी (1984) हुई। उस समय गैस प्रभावितों के बीच हुए सेवा कार्यों को सराहा गया था। हालांकि तब संसाधन और सेवाएं आधुनिक नहीं थीं। इसके बाद 1996 में गठित परिषद कार्यकाल में सत्ता का विक्रेंद्रीकरण हुआ। वार्ड एवं जोनल कार्यालय बने। इसको 1999 में जापान में हुई अंतरराष्ट्रीय मेयर कॉन्फ्रेंस में सराहा गया था। इसी परिषद में पार्षदों को विकास कार्यों के लिए निधि देने का निर्णय लिया गया। जिसे प्रदेश की अन्य निगमों में स्वीकार किया गया। इसी दौर के चलते पार्षदों को जिला सरकार में निर्वाचित सदस्य के रूप में स्वीकार करने का फैसला हुआ। -अलीम बजमी, न्यूज एडिटर, दैनिक भास्कर भोपाल

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