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रात में गार्ड की ड्यूटी, दिन में करता था पेंटिंग, अब लंदन में बिकतीं हैं इनकी कलाकृतियां

मध्य प्रदेश के आदिवासी गोंड चित्रकार भज्जू श्याम को पद्मश्री अवार्ड देने की घोषणा।

Sumit Pandey | Last Modified - Jan 27, 2018, 06:41 PM IST

  • रात में गार्ड की ड्यूटी, दिन में करता था पेंटिंग, अब लंदन में बिकतीं हैं इनकी कलाकृतियां
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    आदिवासी गोंड पेंटर भज्जू श्याम को पद्मश्री अवार्ड देने की घोषणा।

    भोपाल।मध्य प्रदेश के आदिवासी गोंड चित्रकार भज्जू श्याम का नाम लगभग सभी जानते हैं। भारत सरकार ने उन्हें नागरिक सम्मान पद्मश्री अवार्ड देने की घोषणा की है। भज्जू श्याम बचपन में दीवारों को रंगने में मां की मदद का हुनर इतना काम आएगा, ये शायद भज्जू श्याम ने भी नहीं सोचा होगा। उनकी मां घर की दीवारों पर पारंपरिक चित्र बनाया करती थी। फिर चाचा ने कूची पकड़ाई तो जिंदगी को एक नयी दिशा मिल गई। शुरुआत में भज्जू श्याम रात में गार्ड की ड्यूटी करता था और दिन में पेंटिंग करता था। - पढ़ें पद्मश्री भज्जू श्याम की पूरी कहानी...

    कला से बस इतना सा नाता
    -जबलपुर के पाटनगढ़ गांव में जन्मे भज्जू का कला से नाता इतना ही थ। घर की दीवारों पर चित्र बनाते समय जब मां के हाथ ऊंचाई तक नहीं पहुंचते तो वो उसे पूरा करते थे।
    फिर ऐसे बदली जिंदगी
    -आर्थिक अभाव के चलते 16 साल की उम्र में वो अपने चाचा जनगढ़ श्याम के पास भोपाल आ गए।
    -जो उस वक़्त भारत भवन में बतौर आदिवासी चित्रकार काम कर रहे थे।
    रात में पहरेदारी और दिन में रंग भरते
    - इस दौरान वो रात में पहरेदारी के काम के साथ दिन के समय अपने चाचा के चित्रों में रंग भरने का काम करने लगे।
    -धीरे-धीरे जब भज्जू का हाथ जम गया तो अपने चाचा की सलाह पर उन्होंने स्वतंत्र रूप से चित्रकारी शुरू की।
    जब पेरिस में लगी चित्र प्रदर्शनी
    -1998 में पेरिस में एक प्रदर्शनी में उनके गोंड चित्रों को खूब सराहा गया, उसके बाद उनके चित्र कई देशी-विदेशी प्रदर्शनियों का हिस्सा बने।

    दुनियाभर में लंदन जंगल बुक की धूम
    -उनकी किताब 'लंदन जंगल बुक' पांच विदेशी भाषाओं के साथ हिंदी में भी छापी गई है। 2001 में उन्हें 'बेस्ट इंडिजिनस आर्टिस्ट' का अवार्ड मिला।
    -भज्‍जू को विदेश में अपनी पेंटिंग दिखाने का बड़ा मौका 1998 और 2001 की पेरिस प्रदर्शनी के दौरान मिला।

    -इसके बाद उन्हें लंदन जाने का मौका मिला, जहां उन्होंने करीब दो महीने बिताए। विदेश से आने के बाद भज्जू के पास वहां के बारे में बताने के लिए सैकड़ों कहानियां थीं।

    -वे बताते हैं कि लंदन से लौटने के बाद करीब 10 दिन तक बस एक ही शब्द जुबान पर था लंदन, लंदन और सिर्फ लंदन।
    1200 में बिकी पहली पेटिंग
    -चाचा के सानिध्य में भज्जू श्याम का हुनर धीरे-धीरे निखरने लगा. कुछ ही दिनों में वह एक लाजवाब आर्टिस्ट बनकर उभरे। अब सफलता भी उनके कदम चूमने लगी थी. मौका था दिल्ली में आयोजित एक प्रदर्शनी का. इस प्रदर्शनी में उनकी पांच पेंटिंग बिकी, जिसमें एवज में उन्हें कुल 1200 रुपए मिले।

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    भज्जू श्याम की बेटी भी पिता के पदचिन्हों पर चलकर पेंटर बनना चाहती हैं।
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    आदिवासी गोंड पेंटर भज्जू श्याम को पद्मश्री अवार्ड देने की घोषणा।
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    ये है भज्जू श्याम की गोंड पेंटिंग।
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    ये है भज्जू श्याम की गोंड पेंटिंग।
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    अपनी पेंटिंग दिखाते भज्जू श्याम।
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    ये है भज्जू श्याम की गोंड पेंटिंग।
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    दुनियाभर में आदिवासी गोंड कला को लेकर जाने का श्रेय भज्जू श्याम को।
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Web Title: Tribal Gond Painter Bhajjya Shyam Has Received The Padma Shri Award
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