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DB Interview : अंग्रेजी हुकूमत में खामियों के साथ भारत लौटी गणित, इसलिए कठिन

2 वर्ष पहले
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भोपाल.  भारत के पहले सुपर कम्प्यूटर परम की टीम के जाने-माने सदस्य प्रो. सीके राजू दुनिया के प्रसिद्ध गणितज्ञ हैं। गणित और भौतिकी पर उनकी कई किताबें हैं। जैसे-कल्चरल फाउंडेशन ऑफ मैथमेटिक्स, यूक्लिड एंड जीसस और टूवार्ड्स ए कांसिस्टेंट थ्योरी। दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में उनके लेक्चर हुए हैं। पिछले दिनों भोपाल आए प्रो. सीके राजू की विजय मनोहर तिवारी से विशेष बातचीत।


सवाल- आर्यभट्‌ट पर आपका लेक्चर मशहूर है। कुछ बताएं उनके बारे में?
जवाब-
पांच सौ साल के अंतराल में भारत में आर्यभट्‌ट नाम के दो गणितज्ञ हुए हैं। एक ने महासिद्धांत लिखा, दूसरे ने आर्यभटीय। कम लोगों को पता है कि वे दलित वर्ग से थे। आप कल्पना कर सकते हैं कि केरल के उच्चवर्गीय नंबूदरी ब्राह्मण नीलकंठ सोमसुत्वन उनके शिष्य हुए। गणित के ज्ञान में आर्यभट्‌ट स्क्ूल ऑफ केरल इतिहास प्रसिद्ध है।


सवाल- भारत में गणित इतना कठिन क्यों है, जबकि हमारे यहां इसकी हजारों साल पुरानी उत्पत्ति और विकास परंपरा है?
जवाब- 
इसे समझना बहुत जरूरी है। अपनी ही पुरानी ज्ञान परंपरा से भारत का कनेक्ट यूरोप के जरिये है। यूरोपियन विद्वानों के पास भारतीय गणित का ज्ञान अरब के जरिये गया। वह आयात किया हुआ था। अक्सर नकल करने वाला मूल बात को समझता नहीं है। वह गलतियां करता है। यूरोपियन ने भी गणित के कई प्राचीन प्रतीकों को उसके मूल अर्थ में नहीं समझा। अपने ही अर्थ लगा लिए। वे अलजेब्रा, ट्रिगनॉमेट्री आैर केलकुलस को समझे ही नहीं। अंग्रेजी हुकूमत में उनकी अधकचरी नकल वापस भारत लौटी। इस औपनिवेशिक शिक्षा में वही गलतियां भारतीयों के पास आ गईं। इस दंभ के साथ कि हम तो सब जानते हैं। गणित के कठिन होने की मूल वजह यही है।
 

सवाल- कोई उदाहरण दे सकते हैं?
जवाब
- मैं पिछले 15 साल से यही समझाने की कोशिश कर रहा हूं। अंग्रेजों ने सामान्य गणित को इतना कठिन बना दिया कि एक और एक जुड़कर दो होते हैं। यह सिद्ध करने के लिए रसेल जैसे गणितज्ञों ने 378 पेज में समझाया। उन्हें गणित का नोबेल मिल गया। सामान्य गणित ही गलत है उनका। मगर औपनिवेशिक विशिष्टता ने उनके उधार ज्ञान को शिखर पर स्वीकार किया। यह आज के टीचर की नहीं, उस विषय की समस्या है। जो यूरोपियन ने कहा, हमने अंतिम सत्य मान लिया।
 

सवाल- क्या पश्चिम की सब मान्यताएं मिथ्या हैं?
जवाब- 
उनका दावा है कि असली गणित ग्रीक की देन है। जैसे-पाइथागोरस और यूक्लिड आदि। मेरा कहना है कि पाइथागोरस ही मिथ्या है और यूक्लिड का भी कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। मैंने तो यूक्लिड के बारे में ऐतिहासिक प्रमाण देने के लिए कई साल पहले इनाम घोषित किया। माान्यता है कि यूक्लिड का लिखा टेक्स्ट एलीमेंट अलेक्जेंड्रिया से अफ्रीका आया।

 

सवाल- गणित की पढ़ाई को अासान बनाने के लिए क्या सुधार करना चाहिए?
जवाब-
हमारे पाठ्यक्रमों की कठोर समीक्षाएं होनी चाहिए। गणित की सभी शाखाओं पर खुले दिमाग से व्यापक बहस होनी चाहिए। बड़े शिक्षा संस्थानों को ऐसी क्रांतिकारी पहल करनी ही होगी। ऐसा मंथन भारतीय मस्तिष्क को गणित के अपने अासान मूल से जोड़ देगा। मेरा दावा है कि इस कदम से गणित के प्रति हम सबका नजरिया बदलेगा। सबसे पहले हमें दिमाग से निकालना चाहिए कि हमारा सब दकियानूसी है और पश्चिम से आया ही सब सच।

 

सीके राजू की थ्योरी

- पश्चिम में मैथ्स धर्मशास्त्र से जुड़ा है। यह धार्मिक पृष्ठभूमि से निकला शब्द है। हमने बगैर सोचे उसे सच माना।
- भारत में केलकुलस का इस्तेमाल खेती और नाविक शास्त्र में होता था। दोनों में ही बहुत बारीक साइन वैल्यू की जरूरत थी। खेती के लिए बारिश की जरूरत कैलेंडर पर निर्भर थी। ओवरसीज ट्रेड के लिए नेविगेशन में दिशा का ज्ञान जरूरी था। हमने इनके लिए हमने दशमलव के बाद छह शून्य तक के महीन फर्क खोजे।
- वास्कोडिगामा और कोलंबस को नेविगेशन आता ही नहीं था। वास्कोडिगामा ने कालीकट आकर दिशासूचक ज्ञान को समझा। कोलंबस को भी पृथ्वी की त्रिज्या का ज्ञान नहीं था। वे कम्पास का इस्तेमाल करते थे। गणित ज्ञान में वे कमजोर थे। यूरोपियन कैलेंडर त्रुटिपूर्ण था। चोरी के ज्ञान से उन्होंने अपना अज्ञान दूर किया।

 

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