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जिस कुंड के पानी से नानकजी ने ठीक किया था एक व्यक्ति का कोढ़, वह अब भी मौजूद

9 महीने पहले
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यह तस्वीर 1950 से 1952 के बीच की है।
  • 500 साल पहले टेकरी गुरुद्वारा साहब अाए थे गुरुनानक देव
  • नवाबीकाल में मिली थी गुरुद्वारा के लिए ईदगाह हिल्स की यह जमीन

सिटी रिपोर्टर  | भोपाल गुरुनानक देव का 550वां प्रकाश पर्व 12 नवंबर को मनाया जाएगा। इसके पूर्व 9 नवंबर को सिख समाज द्वारा नगर कीर्तन यात्रा निकाली जाएगी। कीर्तन दरबार व अन्य अायोजन भी किए जाएंगे। इस दौरान सर्वाधिक अास्था व अाकर्षण का केंद्र ईदगाह हिल्स स्थित टेकरी गुरुद्वारा रहेगा, जहां 500 साल पहले भारत भ्रमण के दौरान गुरुनानक देव अाए थे। उनके चरण चिह्न यहां एक पत्थर पर स्मृति के रूप में आज भी मौजूद हैं। प्रकाश पर्व पर चरण स्थली पर दीप प्रज्ज्वलित किए जाएंगे। कमेटी के सचिव अमरीक सिंह ने बताया कि 9 नवंबर को शाहजहांनाबाद रेजीमेंट रोड स्थित गुरुद्वारा से कीर्तन चल समारोह निकाला जाएगा, जो विभिन्न मार्गों से होता हुअा हमीदिया रोड नानकसर गुरुद्वारा पहुंचेगा। अगले दिन अखंडपाठ, 11 नवंबर को कीर्तन दरबार सजेगा। 12 नवंबर को कीर्तन दरबार व दीवान सजने के साथ ही कई अन्य अायोजन होंगे।  

नानकजी ने ठीक किया था एक व्यक्ति का कोढ़
गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी के संस्थापक व प्रथम अध्यक्ष सरदार गुरुबख्श सिंह के पुत्र सरदार तेजकुलपाल सिंह पाली बताते हैं कि गुरुनानक देव भारत यात्रा के दौरान भोपाल अाए थे। तब वे यहां ईदगाह टेकरी पर कुछ समय रुके थे। मेरे पिता बताते थे कि यहां एक कुटिया में गणपतलाल नाम का व्यक्ति रहता था, जिसे कोढ़ था। पीर जलालउद्दीन के कहने पर वह उस समय यहां अाए गुरुनानक देव से मिला और उनके चरण पकड़ लिए। गुरुजी ने अपने साथियों से पानी लाने को कहा तो वे पानी खोजने निकल गए, लेकिन अासपास पानी नहीं मिला तो उन्होंने पुन: भेजा। इस बार उन्हें यहां एक जल स्रोत फूटता दिखाई दिया। इस जल को उन्होंने गणपत के शरीर पर छिड़का तो वह बेहोश हो गया। जब उसकी अांख खुली तो नानकजी वहां नहीं थे, लेकिन वहां उनके चरण बने दिखाई दिए और गणपतलाल का कोढ़ भी दूर हो चुका था। वे कहते हैं कि इसका उल्लेख दिल्ली व अमृतसर के विद्वानों व इतिहासकारों ने भी कई जगह किया है।
 

नवाबीकाल में मिली थी गुरुद्वारा के लिए जमीन
प्रबंधक कमेटी के वर्तमान अध्यक्ष परमवीर सिंह ने बताया कि सरदार गुरुबख्श सिंह ने नवाबी रियासत में ही इस जगह को गुरुद्वारा के लिए ले लिया था। उन्होंने बताया कि गणपतलाल की कुटिया स्थली, जल स्रोत कुंड व चरण चिह्न अब भी मौजूद हैं, जिन्हें कवर्ड कर संरक्षित किया जा चुका है। यह स्थान गुरुद्वारा बावली साहब रामनगर के नाम से भी जाना जाता है।

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