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मप्र / ओबीसी आरक्षण बढ़ाने को चुनौती देने के सभी मामलों में सरकार दो सप्ताह में जवाब दे : हाईकोर्ट

सरकार ने कोर्ट को बताया कि ओबीसी के अलावा आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए भी आरक्षण का प्रावधान रखा। सरकार ने कोर्ट को बताया कि ओबीसी के अलावा आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए भी आरक्षण का प्रावधान रखा।
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सरकार ने कोर्ट को बताया कि ओबीसी के अलावा आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए भी आरक्षण का प्रावधान रखा।सरकार ने कोर्ट को बताया कि ओबीसी के अलावा आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए भी आरक्षण का प्रावधान रखा।

  • अब तक कुल 11 याचिकाएं दायर, अगली सुनवाई 28 जनवरी को

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2020, 04:31 PM IST

भोपाल. मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी के मद्देनजर शासकीय सेवाओं में ओबीसी को दिया जाने वाला आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 फीसदी करने को चुनौती देने वाली अब तक 11 याचिकाएं हाईकोर्ट में दायर हो गई हैं। हाईकोर्ट ने सोमवार को राज्य सरकार को सभी नए मामलों में 2 सप्ताह में जवाब पेश करने के निर्देश दिए। चीफ जस्टिस एके मित्तल और जस्टिस विजय शुक्ला की खंडपीठ ने मामले पर अगली सुनवाई 28 जनवरी को निर्धारित की है। 

यूथ फॉर इक्वेलिटी संस्था, नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के डॉ. पीजी नाजपांडे, मेडिकल छात्र आशिता दुबे, रिचा पांडे, पीएससी उम्मीदवार सूर्यकांत शर्मा, पियूष जैन आदि ने याचिका दायर कर बताया कि मप्र सरकार ने ओबीसी वर्ग को आरक्षण का लाभ 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 एवं 16 की उपधारा 4 का खुला उल्लंघन है। अधिवक्ता सिद्धार्थ राधेलाल गुप्ता ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संविधान पीठ ने 1995 में इंदिरा साहनी विरुद्ध केन्द्र सरकार के मामले में स्पष्ट आदेश दिया था कि किसी भी परिस्थिति में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। राज्य सरकार ने ओबीसी कोटे का आरक्षण 14 से 27 फीसदी बढ़ा दिया, जिस कारण कुल आरक्षण 63 प्रतिशत हो गया।

कोर्ट को बताया गया कि ओबीसी के अलावा आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए भी सरकार ने 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा है। ऐसे में सामान्य वर्ग के लिए केवल 27 प्रतिशत सीट ही शेष बचती हैं, जो कि पूर्ण रूप से अन्याय है। मप्र ओबीसी एडवोकेट एसोसिएशन व एक छात्र अमर नामदेव ने याचिका दायर कर बताया कि नया कानून प्रदेश की हाईकोर्ट की भर्तियों एवं अधीनस्थ अदालतों में सिविल जजों सहित अन्य भर्तियों में लागू नहीं किया है। याचिकाओं में मांग की गई है कि आरक्षण का उक्त प्रावधान इन भर्तियों में भी किया जाए।

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