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1883 में सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे आदिवासी

आज आदिवासियों के प्रति हमें हमारी सोच बदलने की आवश्यकता है। वे और हम अलग नहीं है। ये जो विभाजनकारी भावना पैदा कर दी...

Danik Bhaskar | Sep 13, 2018, 02:21 AM IST
आज आदिवासियों के प्रति हमें हमारी सोच बदलने की आवश्यकता है। वे और हम अलग नहीं है। ये जो विभाजनकारी भावना पैदा कर दी गई है उसने आदिवासी और अन्य समाज को अलग-अलग खड़ा कर दिया है। यह कहना है पद्मश्री अशोक भगत का। वे बुधवार को दत्तोपंत ठेंगडी शोध संस्थान और संस्कृति विभाग की ओर से मेपकास्ट परिसर में मध्यवर्ती भारत नए आयाम इतिहास संस्कृति एवं जनजातीय परंपरा विषय पर आयोजित संगोष्ठी में बोल रहे थे। नक्सल आंदोलन से आदिवासियों को जोड़े जाने को लेकर उन्होंने कहा- आदिवासी हिंसा के पक्षधर नहीं हैं। अहिंसा और सत्य के साथ उन्होंने ही सबसे पहले 1883 में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन चलाया था। किसी समाज का विकास करना है, तो उसकी गौरवशाली परंपरा बनाए रखें और उसे आत्म हीनता का शिकार न बनाएं। जनजातियों के गौत्र पहाड़, पशु-पक्षियों के नाम पर जनजाति समाज और संस्कृति विषय पर आयोजित सत्र में प्राध्यापक डॉ. धर्मेंद्र पारे ने कहा- जनजातियों के लोग आपस में मिलने पर परिचय में अपनी बोली में स्वयं को मनुष्य बताते हैं। उन्होंने कहा कि कोरकू भाषा में एक अक्षर से ही शब्द बन जाते हैं। चार और पांच अक्षरों से मिलकर बनाने वाले शब्द बहुत कम हैं। उनके समाज में स्त्री पक्ष का बहुत सम्मान है। डॉ. दीप्ति श्रीवास्तव ने जनजातियों की भाषा के संरक्षण के लिए कार्य किए जाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा- नक्सलवादी जनजातियों की भाषा सीखकर उनके माध्यम से अपने मनसूबे पूरे कर रहे हैं।