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संवाद कार्यक्रम / भोपालियों का सेंस ऑफ ह्यूमर बुरे वक्त में भी कम नहीं होता : जावेद अख्तर

भोपाल में गुफ्तगू कार्यक्रम में मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख्तर। भोपाल में गुफ्तगू कार्यक्रम में मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख्तर।
जावेद अख्तर ने भोपाल और उनसे जुड़े किस्से सुनाए। जावेद अख्तर ने भोपाल और उनसे जुड़े किस्से सुनाए।
जावेद ने भोपाल में अपने संघर्ष की दास्तान सुनाई और लोगों को हंसाया भी। जावेद ने भोपाल में अपने संघर्ष की दास्तान सुनाई और लोगों को हंसाया भी।
जावेद साहब को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे। जावेद साहब को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।
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भोपाल में गुफ्तगू कार्यक्रम में मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख्तर।भोपाल में गुफ्तगू कार्यक्रम में मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख्तर।
जावेद अख्तर ने भोपाल और उनसे जुड़े किस्से सुनाए।जावेद अख्तर ने भोपाल और उनसे जुड़े किस्से सुनाए।
जावेद ने भोपाल में अपने संघर्ष की दास्तान सुनाई और लोगों को हंसाया भी।जावेद ने भोपाल में अपने संघर्ष की दास्तान सुनाई और लोगों को हंसाया भी।
जावेद साहब को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।जावेद साहब को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।

  • गीतकार-शायर जावेद अख्तर के साथ संवाद कार्यक्रम गुफ्तगू रखा गया 
  • जावेद ने चिर-परिचित अंदाज में जिंदगी के सभी पहलुओं पर खुलकर चर्चा की

Dainik Bhaskar

Dec 03, 2019, 12:18 PM IST

भोपाल. कोहेफिजा स्थित अहमदाबाद पैलेस रोड पर स्थित दार-उस-सलाम में सोमवार को जावेद अख्तर के साथ संवाद कार्यक्रम गुफ्तगू रखा गया। इस अवसर पर जावेद ने अपने चिर-परिचित अंदाज में अपनी जिंदगी के सभी पहलुओं पर खुलकर चर्चा की। खास बात यह रही कि जावेद की इस गुफ्तगू में भोपाली अंदाज देखने को मिला। इस दौरान जावेद ने भोपाल के लोग, यहां की तहजीब, कला और कलाकारों से जुड़े अनुभवों को साझा करते हुए क्या कहा। पढ़िए उन्हीं के शब्दों में-

भोपाली वो है ही नहीं, जिसमें सेंस ऑफ ह्यूमर न हो, वो कहीं और का है...। भोपाली बुरे से बुरे वक्त में हंस कर जिंदगी गुजार लेता है, उसे मजाक बना लेना उसकी आदत है। ऐसा नहीं है कि यहां सब लोग पहले से खुशहाल थे। मैं तो यहां अब जितनी खुशहाली देखता हूं उस वक्त उतनी नहीं थी। लेकिन खुश तो रहते थे लोग। उनका सेंस ऑफ ह्यूमर बुरे से बुरे वक्त में कम नहीं होता। सच बात तो यह है कि सेंस ऑफ ह्यूमर बुरे वक्त के लिए ही है। उदाहरण के रूप में उन्होंने मिसाल दी - आपकी गाड़ी में जो शॉकब होते हैं, वो एक परफेक्ट और सीमेंटेड रोड पर चलने के लिए थोड़ी न है। वो है जब गड्‌ढे आए, पत्थर आए सड़क पे तो उसके ऊपर भी बैलेंस बनाकर जो निकल ले उसके लिए है।


अपने एक करीबी दोस्त के बारे में चर्चा करते हुए जावेद ने कहा-

मेरे एक दोस्त हैं, मैं उनका नाम नहीं लूंगा। हम लोगों की फोन पर बात होती रहती है। पिछले दिनों उनका फोन आया तो उन्होंने कहा एक किताब छप रही है, हम सोच रहे थे कि तुम आ जाओ तो तुम उसे रिलीज कर दो। मैंने कहां ठीक है आ जाऊंगा। मैंने कहा कब है कार्यक्रम। तो बोले 30 को रखा है। मैंने कहा ठीक है शाम को 4 बजे कार्यक्रम रखना ताकि शाम को 4 से 6 बजे तक कार्यक्रम के बाद मैं रात को 8 बजे की फ्लाइट से वापस चला जाऊंगा। वो बोले अच्छा उसी दिन चले जाओगे। मैंने कहा हां...। वो बोले और आओगे कब। मैंने कहां सुबह की फ्लाइट से आऊंगा। उन्होंने कहा अरे ऐसा मत करो यार, तुम ऐसा करोगे। 30 का फंक्शन है एक काम करों तो तुम 27 को आ जाओ। क्या है तीन दिन की कोई कीमत नहीं है। क्या है जल्दी-जल्दी में टेंशन हो जाता है। जावेद ने कहा वो टेंशन से बचने के लिए मुझे 3 दिन पहले बुला रहे हैं। मैं सोच रहा हूं कि मैं कितने घंटे बचाऊं। यहां उन्हें तीन दिन से कोई मतलब ही नहीं।

एक दूसरा किस्सा सुनाते हुए जावेद ने कहा -

मुझे याद है जब मैं पहली बार मुंबई से 13 साल बाद वापस आया तो मैंने देखा बाकी बातें सब वही हैं। ह्यूमर्स भी एक जैसे ही हैं। 13 वर्ष में ह्यूमर्स भी नहीं बदले। मगर इसका फायदा भी है और नुकसान भी है। फायदा यह है कि लोग खुश रहते है। कोई टेंशन नहीं है, कड़वडाहट नहीं है। नुकसान यह है कि हमारे यहां इतना जबरदस्त टैलेंट है, वो दुनिया को पता ही नहीं चल पाता। इसलिए लोग कहते हैं कौन जाए बाहर यार...। ऐसे ऐसे कवि थे हमारे यहां कैफ साहब, ताज साहब क्या कवि थे। क्या इनकी शायरी है। मगर उनको बाहर निकलने का शौक ही नहीं है। एक बार मुझे साहब मुंबई के पैडर रोड पर मिले। उन्होंने कहा ऐसा है कि मैं पैडर रोड पर ठहरा हुआ हूं। सुबह उठकर सड़क के फुटपाथ पर खड़ा हो जाता हूं और सोचता हूं कि या अल्लाह इतनी गाड़ियां कहां से आ रही हैं और कहां जा रही हैं। 

उन्होंने मुझसे कहां यार जावेद - ये शहर भोपालियों का नहीं है मियां…

अरे साहब सुबह 100 भोपाली छोड़ दोगे तो शाम को इंशा अल्लाह 20 ही मिलेंगे। मैंने कहा क्यों- तो बोले अरे खां कोई गाड़ियों के नीचे आ गया होगा तो कोई बसों में भटभटा रिया होगा। लेकिन भोपाल में चित्रकार, थिएटर, राइटर्स का जबरदस्त टैलेंट है। लेकिन वो एक्सपोजर नहीं मिलता जो उसे मिलना चाहिए। उसकी पहुंच उतनी नहीं हो पाती जो होनी चाहिए। मैंने जिस स्टेंडर्ड के चित्रकार यहां देखे है कहीं और नहीं देखे। हिंदुस्तानी चित्रकार जो न्यूयॉर्क में रहते हैं, उनकी पेंटिंग 1 या 2 मिलियन डॉलर में जाती है। यहां एक पेंटर की पेंटिंग उसी स्टैंडर्ड की 10 या 15 हजार बिकती है। तो कहीं कुछ तो हमारे स्टेब्लिशमेंट में ऐसा करना चाहिए कि आर्टिस्ट या क्रिएटिव लोगों को उनकी मर्जी के खिलाफ एक्सपोजर दिलाया जाए तो उन्हें वहां पहुंचाया जाए। जहां उन्हें पहुंचना चाहिए। यदि इस सिलसिले मैं सेवा कर सकता हूं तो मैं हाजिर हूं। मैं बहुत इज्जत करता हूं भोपाल की क्रिएटिविटी की बहुत ही क्रिएटिव लोगों का शहर है। बहरहाल ये बात हो गई जग बीती की। कहते है कितनी भी बातें कर लीजिए मदारी को बिना तमाशा दिखाए छोड़ते नहीं हैं...।

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