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मेरे दादा मुज़तर खैराबादी के हाथ का लिखा था- न किसी की आंख का नूर हूं, न किसी के दिल का करार हूं... जावेद अख्तर

एक वर्ष पहले
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रवींद्र भवन में आयोजित किया गया कार्यक्रम 'यादे मजाज़-ओ-मुज़तर खैराबादी'  पर गीतकार, शायर जावेद अख्तर ने अपने दादा मुज़तर खैराबादी की गज़लों पर बात की। - Dainik Bhaskar
रवींद्र भवन में आयोजित किया गया कार्यक्रम 'यादे मजाज़-ओ-मुज़तर खैराबादी'  पर गीतकार, शायर जावेद अख्तर ने अपने दादा मुज़तर खैराबादी की गज़लों पर बात की।
  • रवींद्र भवन में आयोजित किया गया कार्यक्रम 'यादे मजाज़-ओ-मुज़तर खैराबादी'
  • इसमें गीतकार, शायर जावेद अख्तर ने अपने दादा मुज़तर खैराबादी की गज़लों पर बात की
  • जावेद अख्तर ने मजाज लखनवी की शायरी और जीवन से जुड़े किस्से भी शेयर किए

भोपाल. रवींद्र भवन में आयोजित कार्यक्रम 'यादे मजाज़-ओ- मुज़तर खैराबादी' में गीतकार, शायर जावेद अख्तर ने अपने दादा मुज़तर खैराबादी की गज़लों पर बात की। उन्होंने सुनाया- न किसी की आंख का नूर हूं, न किसी के दिल का क़रार हूं... जो किसी के काम न आ सके, मैं वो एक मुश्त-ए-गु़बार हूं। ये गज़ल हममें से कई लोगों ने टीवी सीरियल 'बहादुर शाह ज़फर' में सुनी होगी। यह उन्हीं का लिखा माना जाता है लेेकिन ये उनका लिखा नहीं है। ये मेरे दादा मुज़तर खैराबादी के हाथ का लिखा था। 

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इसका किस्सा सुनाते हुए जावेद अख्तर ने बताया सितंबर 2015 में आई किताब 'खिरमन' इस गज़ल पर पुख्ता तौर पर मुज़तर खैराबादी की मुहर लगाती है। रवींद्र भवन में मंगलवार की शाम... 'यादे मजाज़-ओ-मुज़तर खैराबादी' कार्यक्रम में गीतकार, शायर जावेद अख्तर ने अपने दादा मुज़तर की अन्य गज़लों के साथ इस गज़ल पर भी बात की। इस चर्चा में उनके साथ सुहैल अख्तर और इजलाल मजीद भी शामिल हुए। सुहैल ने कहा कि उन्होंने और उनके एक साथी ने खैराबादी पर रिसर्च की। हिंदुस्तान घूमकर 10 वर्ष की रिसर्च के बाद जगह-जगह से एकत्रित किया। उसके बाद दो हजार कलामों का यह संग्रह पांच वॉल्यूम में तैयार हुआ। 

यह कैसे संभव हो पाया इस पर जावेद अख्तर ने रोशनी डाली- 
मेरे वालिद जां निसार अख्तर के इंतकाल के पांच साल बाद मेरे भाई शाहिद ने कहा कि वो घर खाली करके बड़े घर में शिफ्ट होंगे। सामान निकल रहा था... उसी समय एक डिब्बा निकला, जिसमें बहुत सारे कागजात थे। उन्होंने यह ऐतबार करके मुझे भेज दिया कि मैं उसे देखूंगा, कुछ समझ सकूंगा। मैंने उसे घर में रखवा दिया कि फुर्सत जब होगी तब देखेंगे। लेकिन मुंबई की जिंदगी में फुर्सत बहुत मुश्किल चीज है। कई साल निकल गए तो एक दिन अचानक याद आया। डिब्बे से निकालना शुरू किया तो उसमें धोबी के कपड़ों के हिसाब की पर्ची थी। कुछ अखबार थे। कुछ ऐसी कॉपियां थीं, जिसमें अख्तर साहब के फिल्मी गानों की डिटेल्स थीं जो वो लिख रहे थे। ये सब खजाने निकलते रहे और नीचे लाल कपड़े में एक छोटी सी गठरी मिली। मैंने उसे खोला तो उसमें हाथ से लिखी हुई मुज़तर की 125 गज़लें थीं और अख्तर साहब का लिखा हुआ एक कागज भी था। इसका मतलब उन्होंने 125 गज़लों को फाइनल समझा और छपवाने के लिए तैयार कर रखा था।

जयपुर में मिली नोटबुक, उसमें भी शेर लिखे थे 
मैंने सुहैल और उबैद के साथ मिलकर इसे संकलित करने की दिशा में काम शुरू किया। अब वो कतरा-कतरा तेरे दीदार की शबनम टपकी और वो कतरे टपकते ही गए…, कुछ दिनों बाद मैं जयपुर में एक आर्ट एग्जीबिशन के इनॉग्रेशन के लिए गया। तभी एक लड़की आई और बोली- आपसे मेरे वालिद मिलना चाहते हैं, उनके पास मुज़तर साहब के कुछ कागजात हैं। मैं उनसे मिलने गया। उन्होंने बताया कि उनके दादा और मुज़तर की दोस्ती थी। दोनों भोपाल के शीशमहल में रहते थे। उसके बाद मुज़तर यहां से ग्वालियर गए, वहां सरकारी गेस्ट हाउस में रहते थे। मुज़तर के कुछ कागज उनके पास रह गए और कुछ दिनों बाद मुज़तर का इंतेकाल हो गए। यह तीसरी नस्ल है जिनके पास वो कागज हैं। उन्होंने नोटबुक दिखाई जिसमें वो सब लिखा था। उस बुक में हर पेज पर एक शेर लिखा हुआ था। उसके बाद उन्होंने एक लिफाफे में कुछ और कागजात होने की बात कही। उसके बाद उनका भी इंतेकाल हो गया।


कुछ दिन बाद उनकी बेटियों और दामाद का मैसेज आया कि हम आपसे मिलना चाहते हैं। वो आए और उन्होंने मुझे ब्राउन लिफाफा और नोटबुक दिया, जिसमें मुज़तर के हाथ से लिखा था- न किसी की आंख का नूर हूं... इस दरमियान बहुत सारे डॉक्यूमेंट्स एकत्रित होते गए। इस तरह धीरे-धीरे जमा होकर इतना हो गया कि वो संकलन पांच वॉल्यूम में आठ किलो में छपा। उसके बाद भी मैं यह दावा नहीं करता कि यह कुलयात है। क्योंकि जैसे हमको यह मिला और ढूंढ़ते तो कुछ और मिलता।

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