गुरु और शिष्य के बीच एक संवाद है \"द हार्टफुलनेस वे\' : जोशुआ / गुरु और शिष्य के बीच एक संवाद है "द हार्टफुलनेस वे' : जोशुआ

News - मैंने प्राणाहुति और इनर क्लीनिंग की प्रक्रियाओं तक पहुंचते हुए दाजी से ढेरों सवाल किए, जो शायद किसी भी शिष्य के मन...

Bhaskar News Network

May 11, 2018, 02:15 AM IST
गुरु और शिष्य के बीच एक संवाद है
मैंने प्राणाहुति और इनर क्लीनिंग की प्रक्रियाओं तक पहुंचते हुए दाजी से ढेरों सवाल किए, जो शायद किसी भी शिष्य के मन में उपजते होंगे। दाजी से किए गए मेरे उन्हीं सवालों और उनके सार्थक जवाबों का पुलिंदा है किताब द हार्टफुलनेस वे। यह बात साझा की इस बुक के राइटर जोशुआ पोलोक ने। इनके साथ को-ऑथर कमलेश डी पटेल भी बुक लॉन्चिंग सेरेमनी के लिए भोपाल आए। गौरतलब है कि जोशुआ पेशे से म्यूजीशियन हैं और वायलिन बजाते हैं। जोशुआ ने एआर रहमान के साथ दिल्ली-6, रावण और गजनी में संगीत दिया है। द हार्टफुलनेस वे इनकी पहली किताब है। यह किताब पहले इंग्लिश में आई, जिसको हिंदी में कमलेश डी पटेल ने अनुवादित किया।

जनवरी-2018 में लॉन्च जोशुआ पोलोक की इस किताब की रिलीज सेरेमनी गुरुवार को RGPV, बीयू और क्रॉसवर्ड में मनाई गई

जोशुआ पोलोक (दाएं) और कमलेश डी पटेल।

मैं यूएस में था जब हार्टफुलनेस से जुड़ा। 2004-05 में पहली बार दाजी से मुलाकात हुई, उस वक्त वो गुरु नहीं थे। हम गुरु भाइयों की तरह मिले। फिर 2011 में उन्हें हार्टफुलनेस में गुरु के रूप में चुना गया। मैं म्यूजीशियन हूं, म्यूजिक और मेडिटेशन का गहरा संबंध है। जहां तक स्प्रिचुअलिटी और प्रोफेशन की बात है, मुझे लगता है कि दोनों चीजों हमें जीवन में साथ लेकर चलनी चाहिए। यह आपको भीतर से अापके जीवन के हर पहलू को ज्यादा बेहतर बनाने में मदद करती है। हार्टफुलनेस में रहते हुए, मैंने कभी किसी चीज के लिए खुद को बाउंड नहीं किया, लेकिन यहां होने वाला मेडिटेशन कुछ ऐसा नेचुरल पाथ है, जिस पर चलते हुए आप खुद ही बुरी चीजों से दूर होते जाते हैं। तकरीबन 15 सालों से मैं इसमें हूं और लगभग इतना ही समय हुआ मुझे ड्रिंक या नॉनवेज लिए हुए। मैंने अपने व्यक्तित्व में भी के कारण खासे बदलाव किए हैं, इससे आपके ईगोटिज्म, इमोशनल रिएक्टिव नेचर और माइंडनेस व आईनेस के बीच अंतर में बदलाव होता है। इस किताब को लिखने में मुझे दो साल का समय लगा। किताब में मेरे और दाजी के बीच के संवाद हैं, जिसके लिए हमें बार-बार मिलना पड़ा। चेन्नई, हैदराबाद, न्यूयॉर्क कई जगहों पर हम मिले और इन संवादों को किताब में उतारा। एक रोज यूं ही मैं थोड़ा व्यस्त था और मेरे फोन पर दाजी का कॉल आया। मैंने ध्यान नहीं दिया और मेरी दो साल की बेटी ग्रेस ने फोन पिक कर लिया। उसने बड़े मजे से उनसे अपनी ही भाषा में काफी देर बात की, मेरी प|ी ने देखा और मुझसे पूछा कि आखिर ग्रेस इतनी देर से किससे बात कर रही है, तब पता चला कि यह दो दाजी हैं। ग्रेस और दाजी की इस बातचीत से ही मेरे जेहन में यह आया कि क्यों न मैं अपने और दाजी के संवादों को किताब में लिखूं।

बेटी और दाजी की बातचीत सुन आया ख्याल, क्यों न दाजी और अपने संवादों को किताब में लिखूं

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