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अदालत में बताईं सफेदपोश पुरुषों की कुंठाएं, खुलीं स्त्री-दमन की परतें

कलाकारों ने अपने अभिनय से नाटक के दृश्यों को जीवंत बनाया। सिटी रिपोर्टर | भोपाल शहीद भवन में बुधवार को नाटक...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 03, 2018, 02:25 AM IST

अदालत में बताईं सफेदपोश पुरुषों की कुंठाएं, खुलीं स्त्री-दमन की परतें
कलाकारों ने अपने अभिनय से नाटक के दृश्यों को जीवंत बनाया।

सिटी रिपोर्टर | भोपाल

शहीद भवन में बुधवार को नाटक "खामोश अदालत जारी है' का मंचन किया गया। मुकेश शर्मा निर्देशित इस नाटक की प्रस्तुति समांतर थिएटर समूह के कलाकारों ने दी। यह मूलरूप से विजय तेंदुलकर द्वारा रचित है। जिसका हिंदी अनुवाद सरोजनी वर्मा ने किया। इसकी शैली मराठी थिएटर की रही और मराठी शब्दों का प्रयोग बहुतायत से किया गया। यह एक महिला के साथ हुई ट्रेजडी पर केंद्रित है। इस महिला के अपने मामा से रिश्ते हैं और यह रिश्ते उसके जीवन को बदल देते हैं। मुख्य पात्र लीला बेणारे की जीवन-कथा जैसे-जैसे खुलती है, हमारे आसपास के समाज, उसकी सफेद सतह के नीचे सक्रिय स्याह मर्दाना यौन-कुंठाओं और स्त्री के दमन की कई तहें उजागर होती जाती हैं।

मुंबई का एक नाट्य दल अभिरूप न्यायालय यानि मूट कोर्ट द्वारा न्याय प्रणाली की जानकारी देने एक कस्बे में आता है। मंडली का एक अभिनेता समय पर नहीं पहुंच पाता है। स्थानीय व्यक्ति को उसका किरदार निभाने के लिए राजी किया जाता है। ग्रुप की महिला सदस्य लीला बेणारे पर भ्रूण हत्या का काल्पनिक मुकदमा चलाया जाता है। खेल-खेल में कल्पना और याथार्थ के बीच की बारीक रेखा मिट जाती है। उसकी निजता पर हमले किए जाते हैं। प्रेम करने के उसके मौलिक अधिकार को चरित्र हीनता कहकर प्रताड़ित किया जाता है। परंपरावादी सोच उसे अपमानित करती है और पूरे प्रकरण को "अरे ये तो खेल है' कहकर उसके जख्मों पर नमक छिड़का जाता है। समाज की मर्यादा और परंपरा के नाम पर स्त्री की निजता, अस्मिता और स्वतंत्रता पर हमले आज भी जारी है। इस दृष्टि से नाटक आज भी प्रासंगिक लगता है।

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