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बुंदेलखंड युद्ध शैली मार्शल आर्ट से सीख रहे चुस्ती-फुर्ती, व्यायाम और एकाग्रता विकसित करना

मायाराम सुरजन भवन में इन दिनों बुंदेलखंड युद्ध शैली मार्शल आर्ट की वर्कशॉप आयोजित की जा रही है, जिसमें निर्देशक...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 03, 2018, 02:25 AM IST

बुंदेलखंड युद्ध शैली मार्शल आर्ट से सीख रहे चुस्ती-फुर्ती, व्यायाम और एकाग्रता विकसित करना
मायाराम सुरजन भवन में इन दिनों बुंदेलखंड युद्ध शैली मार्शल आर्ट की वर्कशॉप आयोजित की जा रही है, जिसमें निर्देशक बालेंद्र सिंह बालू के ग्रुप के सदस्य इस शैली को सीख रहे हैं। इस शैली के एक्सपर्ट राजकुमार रायकवार इसे एमपीएसडी के स्टूडेंट्स को भी सिखा चुके हैं। उन्होंने अपने पिता भगवानदास रायकवार से यह युद्ध कला सीखी थी। राजकुमार बताते हैं, इस शैली में लाठी, तलवार और बनेटी यानी दोनों हाथ से लाठी चलाना सिखाया जाता है। एक आदमी एक आदमी से फिर एक आदमी कई आदमियों से लाठी के जरिए युद्ध करते हैं और फिर लाठी से अन्य लठैतों को बांध दिया जाता है। इसमें युद्ध की पैंतरेबाजी करना सिखाया जाता है। कलाकारों के लिए नाटक में युद्ध कला सीखना लड़ने के मकसद से ही नहीं बल्कि शरीर में लोच और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए भी होता है। युद्ध कला के जरिए कलाकार सीख पाते हैं कि उन्हें नाटक के दौरान चारों तरफ से होने वाली हलचल और आवाजों किस दिशा से आ रही है यह भी महसूस करना होता है। इस युद्ध कला में बहुत चुस्ती-फुर्ती चाहिए।

वर्कशॉप में युद्धशैली में डंडे के वार को रोकता कलाकार।

क्यों सीखें यह शैली

कलाकारों के लिए यह युद्ध शैली इसलिए सीखना जरूरी है ताकि वे आपस में तालमेल बना पाएं। आपसी समझ, फोकस स्पष्ट करना, अवलोकन क्षमता, फुर्ती, व्यायाम, एकाग्रता विकसित होती है। इस वर्कशॉप में लड़कों के अलावा तीन लड़कियां भी इस शैली को सीख रही है, जिससे आत्मविश्वास और आत्म रक्षा की तकनीक भी आती है।

इस शैली में अाक्रमण करने का अंदाज और तकनीक जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही आत्मरक्षा में दुश्मन से खुद का बचाव करना भी है।

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