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सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की इंडिया करप्शन स्टडी-2018 की रिपोर्ट में खुलासा

सिटीजन एक्टिविज्म के मामले में देश में सबसे पिछड़े हैं हम  हरेकृष्ण दुबोलिया | भोपाल मध्यप्रदेश में...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 22, 2018, 03:10 AM IST

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की इंडिया करप्शन स्टडी-2018 की रिपोर्ट में खुलासा
सिटीजन एक्टिविज्म के मामले में देश में सबसे पिछड़े हैं हम



हरेकृष्ण दुबोलिया | भोपाल

मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार और सरकारी दफ्तरों में रिश्वत मांगे जाने का का सबसे बड़ा कारण नागरिकों का उदासीन रवैया है। रिश्वत मांगे जाने के खिलाफ लोगों का सही फोरम पर और सही समय पर शिकायत नहीं करना ही प्रदेश में भ्रष्टाचार में कमी नहीं आने की सबसे बड़ी वजह है। हाल ही में जारी हुई सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) की इंडिया करप्शन स्टडी-2018 रिपोर्ट के मुताबिक सिटीजन एक्टिविज्म (अपने अधिकारों के प्रति नागरिक सक्रियता) के मामले में मप्र की स्थिति देश में सबसे दयनीय है। भ्रष्टाचार का शिकार होने वाले 77% लोग रिश्वत मांगे जाने के खिलाफ कोई आवाज ही नहीं उठाते हैं। सिर्फ 11% ही शिकायती पत्र, फोन या ईमेल के जरिए विरोध दर्ज करा पाते हैं। 12% सीधे अफसरों के पास जाकर मौखिक शिकायत कर आते हैं, लेकिन कागजी कार्रवाई नहीं करते। इतना ही नहीं सूचना के अधिकार के तहत आवेदन करने वाले सिर्फ 0.6% लोग ही सरकारी दफ्तरों से जानकारी हासिल करते हैं। सिटीजन एक्टिविज्म जांचने के लिए नागरिकों की चार गतिविधियों को आधार बनाया गया है, सूचना के अधिकार का इस्तेमाल, ऑनलाइन कम्प्लेन दर्ज कराना, भ्रष्टाचार के खिलाफ पब्लिक प्रोटेस्ट में हिस्सेदारी, सरकारी सेवाओं के लिए डिजिटल पेमेंट गेटवे का इस्तेमाल।

एक साल में 11 तरह के साधारण कामों के लिए भी 23% लोगों को देनी पड़ी रिश्वत

13 राज्यों की 11 सर्विस के आधार पर तैयार हुई रिपोर्ट;बीते 12 माह में भ्रष्टाचार के शिकार लोगों का रिपोर्ट कार्ड

38% तमिलनाडू

73% तेलंगाना

प्रदेश के 27% लोग मानते हैं भ्रष्टाचार घटा

मीडिया स्टडीज की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में पिछले 12 महीनों में अपने साधारण काम के लिए 23% लोगों को सरकारी दफ्तरों में रिश्वत देनी पड़ी। इन लोगों को अपने काम के लिए किसी की सिफारिश या बिचौलिए की भी सेवाएं लेनी पड़ीं। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के लोगों की धारणा है कि पिछले एक साल में केंद्र सरकार के दफ्तरों में 31% भ्रष्टाचार कम हुआ है। वहीं राज्य के दफ्तरों में सिर्फ 27% ही भ्रष्टाचार में गिरावट आई है। प्रदेश में 51% लोगों का मानना है कि भ्रष्टाचार कम तो हुआ है, लेकिन अभी यह नाकाफी है। 27% मानते हैं कि भ्रष्टाचार घटा है, लेकिन 21% ऐसा नहीं मानते।

36% कर्नाटक

35% बिहार

29% दिल्ली

23% मध्यप्रदेश

20% राजस्थान

22% पंजाब

करप्शन से लड़ाई में ऐसी है मप्र के नागरिकों की स्थिति

2% लोग लेटर लिखकर शिकायत करते हैं।

8% फोन पर शिकायत करते हैं।

1% ई-मेल के जरिए शिकायत करते हैं।

12% मौखिक रूप से ही शिकायत करते हैं।

10% भ्रष्टाचार झेलने वाले ही इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में भाग लेते हैं।

भ्रष्टाचार के खिलाफ ओवरऑल नागरिक सक्रियता

6% भ्रष्टाचार से बचने ऑनलाइन जानकारी लेते हैं।

3% ऑनलाइन भ्रष्ट्राचार की शिकायतें करते हैं।

57% आरटीआई के बारे में जानकारी लेते हैं।

0.6% आरटीआई के जरिए सूचनाएं ले पाते हैं।

हाउसहोल्ड वाइज मप्र में डिजिटल एक्टिविज्म की स्थिति

आधार कार्ड 98%

वोटर कार्ड 94%

बैंक अकाउंट 94%

मोबाइल फोन 96%

इंटरनेट तक पहुंच 40%

ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी 2%

प्रदेश के 6 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो कभी न कभी बैंक एटीएम पिन और पासवर्ड फ्रॉड का शिकार हुए हैं।

इन विभागों में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार

21%

20%

ट्रांसपोर्ट

16%

हाउसिंग/लैंड रिकॉर्ड

पुलिस

10%

हेल्थ सर्विस

फ्री वाईफाई जोन तक सीधे पहुंच 0%

प्रदेश के शहर में फ्री वाइफाई जोन 14%

डिजिटल पेमेंट गेटवे का नियमित इस्तेमाल 1%

कभी कभार

सिर्फ एक बार किया 6 %

सिर्फ दो बार किया 5%

सबसे ज्यादा इनके लिए मांगी जाती है रिश्वत-एफआईआर दर्ज करने, राशन कार्ड बनवाने, मरीज को भर्ती करने, स्कूल में दाखिला, सरकारी उपक्रमों द्वारा गलत बिलों को सुधारने जैसे बढ़े हुए बिजली बिल में गड़बड़ी सुधारने के लिए, ड्राइविंग लाइसेंस के लिए।

औसतन कहां-कितनी ली जाती है रिश्वत

पीडीएस 150 से 250 रुपए

पुलिस 250 से 500 रुपए

ट्रांसपोर्ट 300 से 500 रुपए

बैंक 200 से 5500 रुपए

31%कप्शन केंद्र के कार्यालयों में, जो 2017 में 41% था

जिम्मेदारों के तर्क

यह रिपोर्ट पूरी तरह मप्र पर लागू नहीं होती है। परिवहन विभाग में 93% ट्रांजेक्शन और 19 सर्विसेज ऑनलाइन हो गईं हैं। हम अपनी सभी सेवाओं को पारदर्शी बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। - शैलेंद्र श्रीवास्तव, आयुक्त, परिवहन

जहां तक मेरी जानकारी है इस सर्वेे में फीडबैक देने वाले 84% लोग ऐसे थे जिनका पाला पुलिस से कभी नहीं पड़ा। खैर, हमारे यहां लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू जैसी संस्थाए हैं, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार कार्रवाई करती हैं। - मकरंद देउस्कर, एडीजी, मप्र पुलिस

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