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चाहतें जाहिल हैं मेरी, अब भी तेरी आरज़ू करती हैं

द ग्रेट इंडियन फिल्म एंड लिटरेचर फेस्टिवल (GIFLIF) के तहत रविवार को पोएट्री ऑन क्रूज के दूसरे सीजन का आयोजन किया गया।...

Dainik Bhaskar

Jul 23, 2018, 03:25 AM IST
चाहतें जाहिल हैं मेरी, अब भी तेरी आरज़ू करती हैं
द ग्रेट इंडियन फिल्म एंड लिटरेचर फेस्टिवल (GIFLIF) के तहत रविवार को पोएट्री ऑन क्रूज के दूसरे सीजन का आयोजन किया गया। दैनिक भास्कर के सहयोग से हो रहे GIFLIF में मप्र स्टेट टूरिज्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन, डिपार्टमेंट ऑफ कल्चर, एलआईसी और व्हाइट वॉल्स मीडिया भी सहयोग कर रहे हैं। पोएट्री ऑन क्रूज़ की शुरुआत अंकित छीपा ने आशावादी और निराशावादी दो, तरह की कविताएं सुनाकर की। गुलजार के बेटे के नाम से यंग पोएट्स में पॉपुलर प्रतीक सिंह चौहान ने लाहौर का किस्सा अलग अंदाज में पेश किया। दिल्ली के गौरव सक्सेना ने कहा, जी हां एक अहाता था लोग ये बताते हैं, राम वहां रहते थे... सुनाया। जिसे आगे बढ़ाते हुए पूजा शाह ने मैं समर अवशेष हूं... गीत पढ़ा।

पोएट्री ऑन क्रूज़ में देशभर से आए 35 युवाओं ने अपनी रचनाएं सुनाईं। अन्य फोटोग्राफ्स व कविताएं पेज 18

... और छलक पड़े आंसू

19 साल की अरुणिमा ने कविता एन आर्टिस्ट... पढ़ी। अरुणिमा ने बताया, मैंने अपने भाई की वजह से कविताएं लिखना शुरू किया। वे चाहते थे कि मैं कविताएं लिखूं, मगर उस वक्त हिम्मत नहीं हुई। मैं पढ़ाई के लिए शहर से बाहर थी। मुझे फोन आया कि भाई ने फांसी लगा ली है। काश, मैं उनका दर्द बांट पाती। बस उसी भाई को जेहन में रख मैंने कविताएं लिखना, मंचों पर पढ़ना शुरू किया। इस मौके पर अरुणिमा ने कविता पूछा... सुनाई और अपने भाई को पोएटिक ट्रिब्यूट दिया।

कठुआ कांड पर गौरव सक्सेना अदीब

जी हां एक अहाता था लोग ये बताते हैं

राम वहीं रहते थे, हां उसी अहाते में,

एक दिन शिकारी कुछ, एक नन्ही चिड़िया को

घर दबोच लाए थे

लोग ये बताते हैं वो जो शिकारी थे...

थे नहीं वो हम पेशा, थी अलग उमर सबकी

रामभक्त थे लेकिन, रामराज लाने को

एक नन्हीं चिड़िया थी, बहुत नन्हीं चिड़िया थी

डॉ. शिव मिश्रा

सोचा उन्हें रिझाएं, क्यूं न नगमा कोई सुनाएं,

या शायर ही बन जाएं, दो एक शेर ही फरमाएं,

शान-ए-चश्म कुछ लिखा, कुछ सुर्ख गाल पर,

कुछ कह लिया झुमकों पे भी और रूमाल पर,

और अंदाज़ भी रूमानी रखा... बहरहाल, पर

वो बहरे पे हंसती रहीं... हम अपने हाल पर।

विनीत वर्मा

मेरे सीने में अब मेरा दिल कि कुछ यूं नहीं है,

जैसे किताब में दबे उस गुलाब में खुशबु नहीं है,

क्या कहें, क्या हुआ, दौर-ए-हिज्र का अंजाम,

तेरी आरज़ू तो है पर, अब वो जुस्तजू नहीं है,

मिलता तो है तू मुझसे, मेरे तसव्वुर में अक्सर,

हम गिला भी नहीं कर सकते कि तू रूबरू नहीं है,

मैं दयार-ए-इश्क़ में, नमाज़-ए-यार पढ़ रहा हूं,

क्या रूठेगा खुदा भी आखिर, गर की वजू नहीं है,

चाहतें जाहिल हैं मेरी, अब भी तेरी आरज़ू करती हैं,

क्या इन्हे अब तक नहीं मालूम कि तू अब तू नहीं है।

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