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रमजान में बेल और तुख्में बलंगा का शर्बत पीते थे

Danik Bhaskar | May 18, 2018, 03:40 AM IST

बारा महल में रहने वाले फारूकी का जन्म तो लखनऊ के पास गांव संदीला में हुआ, लेकिन भोपाल शहर को उन्होंने अपना कर्म क्षेत्र बना लिया। 72 वर्षीय फारूकी का कहना है कि पहले और अब के रमजान में सेहरी और इफ्तार के लिए सजे दस्तरखान को देखकर आर्थिक बदलाव का नजारा दिखाई देता है। उनके बचपन के दौर में गुरबत का जमाना था। तब गर्मियों में रमजान आने पर बेल या तुख्मे बलंगा का शर्बत का इस्तेमाल होता। अमीरों के यहां फालसा का शर्बत पिया जाता। कई घर-घर में सत्तू पीने का चलन रहा। बर्फ को पहले से लाकर लकड़ी के बुरादे में छुपा देते थे ताकि घुल न जाए। इफ्तारी बहुत साधारण होती लेकिन अब आधुनिक युग में इसकी गुजांइश नहीं बची। इसी तरह से पहनावे के नाम पर सिर्फ कुर्ता-पजामा ही था। उन्होंने आठ बरस की उम्र में पहली बार रोजा रखा था। तब वालिद ने उनके लिए खासतौर पर शेरवानी सिलवाई थी। वो खुशी के पल उन्हें अब भी गुदगुदाते हैं। पहले लाउडस्पीकर का चलन नहीं था। सेहरी का वक्त होने पर नगाड़े बजाकर शहर को सूचना दी जाती तो कई टोलियां मोहल्ले में लोगों को जगाने के लिए निकलतीं। इफ्तार के वक्त भी इसको दोहराया जाता। बाद में ये रिवायत खत्म हो गई। फिर गोले छूटने लगे। इसके पहले रमजान का चांद दिखाई देने पर बुजुर्गों को सलाम करने सबसे पहले घर को आते, लेकिन अफसोस ये रिवायत अब खत्म हो चली हैं। ईद की नमाज अदायगी के बाद कब्रिस्तान जाकर पूर्वजों की कब्रों पर फातिहा पढ़ते। ये रिवायत अभी बाकी हैं। भोपाल में नमाज अदायगी के बाद कब्रिस्तानों के बाहर जाम की स्थिति बन जाती हैं। जिया फारूकी उर्दू में अफसाने भी लिखते हैं। उनके अफसानों में अमूमन आम आदमी की कहानी है। उनकी आठ किताबों का प्रकाशन हो चुका है। उनकी शायरी में गुरबत से लेकर इंसानी मसाइल शामिल है तो उर्दू अदब की जानी-मानी शख्सियत सोहा मुजहद्दी पर उनका लिखा आलेख काफी लोकप्रिय हुआ।

जिया फारूकी

रमजान-उल-मुबारक माह आत्म संयम सिखाता है। बंदे रमजान की हिदायत पर अमल करते हुए जिंदगी को खुशगवार बना सकते हैं यह कहना है, शायर जिया फारूकी का।