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बुनियादी जरूरतें पूरी हों तो जीने का अधिकार सार्थक होगा

Dainik Bhaskar

Jul 13, 2018, 04:10 AM IST

News - करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच महेश तिवारी, 20 माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय,...

बुनियादी जरूरतें पूरी हों तो जीने का अधिकार सार्थक होगा
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करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच

महेश तिवारी, 20

माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल

maheshjournalist1107@gmail.com

संविधान का अनुच्छेद-21 अवाम को जीवन जीने का अधिकार देता है लेकिन, अधिकार फलीभूत कब हो सकता है, जब लोगों को भूख मिटाने के लिए भोजन, बीमारियों से बचने के लिए दवा और रहने के लिए छत मयस्सर हो। लेकिन, दुर्भाग्य से संविधान लागू होने के इतने वर्षों बाद भी देश में गरीब कौन है इसका सटीक निर्धारण हमारी सरकारें नहीं कर पाई हैं और न उनके के लिए आवश्यक बुनियादी जरूरतों का इंतजाम हो पाया है। सरकारें जनोन्मुखी और सामाजिक सरोकार से जुड़ीं होने का दम्भ तो भरती हैं लेकिन, तथ्यों की गहराई में असलियत उलट ही मिलती है।

वैसे देखें, तो वैश्विक पटल पर सिर्फ कृषि ही एकमात्र क्षेत्र है, जिसे सच्चे अर्थों में उत्पादन कहा जा सकता है। एक दाना खेत में डालने पर सैकड़ों दाने उपज होती है। शेष वस्तुएं सीमित हैं, जिन्हें रीसाइकिलिंग के जरिये पुनः बनाया जाता है। देश के उत्तर-पश्चिम इलाके के किसानों ने पहले से ही गेहूं, चावल, रुई और अन्य फसलों का सरप्लस भंडार तैयार कर लिया है। बस हमें इसी हरित क्रांति को देश के अन्य हिस्सों तक ले जाने के साथ कृषि को आधुनिक तकनीक से लैस करना होगा। इसके साथ हमें अपनी शिक्षा पद्धति में तत्काल बदलाव करना होगा।

हम जो फिजूल की दुनियाभर की बातें पढ़ते हैं उसकी बजाय बच्चों की पांचवीं के बाद ही काउंसलिंग करके उसे सिर्फ उस क्षेत्र की शिक्षा दी जाएं, जिसमें वह अपना भविष्य बनाना चाहे। सरकारों को शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र को सुगम बनाना चाहिए, जिससे सबकी पहुंच सुनिश्चित हो सकें। बेहतर कामगार तैयार करने पर जोर हो। प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार हो। सभी के लिए अपना विकास करने के लिए खुला आकाश हो। उसके बाद भी जो सच में गरीब हो, उनके खाते में सीधे पैसे भेजें जाएं। टैक्स चोरी करने वालों पर कड़ाई दिखाई जाएं और उसे देश की गरीबी दूर करने के उपयोग में लाया जाए। फिर शायद देश की तस्वीर कुछ अलग देखने को मिल सकती है।

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