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इमोटिकॉन्स और स्पेलचेक ने हमारी भाषा से शब्द खत्म कर दिए हैं : शंकर

News - आगामी 3 से 5 अगस्त तक भोपाल में द ग्रेट इंडियन फिल्म एंड लिटरेचर फेस्टिवल (GIFLIF) का आयोजन किया जा रहा है। इस फेस्टिवल...

Dainik Bhaskar

Jul 31, 2018, 04:10 AM IST
इमोटिकॉन्स और स्पेलचेक ने हमारी भाषा से शब्द खत्म कर दिए हैं : शंकर
आगामी 3 से 5 अगस्त तक भोपाल में द ग्रेट इंडियन फिल्म एंड लिटरेचर फेस्टिवल (GIFLIF) का आयोजन किया जा रहा है। इस फेस्टिवल में थिएटर आर्टिस्ट और स्टोरी टेलर केसी शंकर शामिल हो रहे हैं। आयोजन से पहले सिटी भास्कर ने केसी शंकर से खास बातचीत की। केसी शंकर जश्न-ए-कलम के माध्यम से स्टोरी टेलिंग की खास विधा में मंटो, पतरस बुखारी, इस्मत चुगताई, अमृता प्रीतम, मुंशी प्रेमचंद की कहानियों को आम लोगों तक पहुंचा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पतरस बुखारी, मंटो और इस्मत चुगताई जैसे लेखकों की लिखी कहानियों को लोगों तक पहुंचाने में कई बार हमें कुछ शब्दों के प्रयोग के बाद उनके मायने बताने पड़ते हैं, क्योंकि अब लोगों की वोकैब्लरी, इमोटिकॉन्स और स्पेलचेक के कारण खत्म होती जा रही है। इस बात पर मुझे याद आती है वह बात, जब किसी ने हरिवंशराय बच्चन से यह कहा कि आपने जो शेक्सपियर के नाटक का अनुवाद किया है, वह बहुत ही क्लिष्ट है। इस पर उन्होंने दो तर्क दिए थे, पहला तर्क : हर किरदार की अपनी भाषा होती है, वह आपकी भाषा में बात नहीं कर सकता। यदि आपकी वोकैब्लरी इतनी सीमित है और आप समझ नहीं पा रहे तो यह आपकी समस्या है, उसकी नहीं। और दूसरा तर्क यह है कि आप यह उम्मीद क्यों करते हैं कि आपके 500 या 1000 शब्दों की वोकैब्लरी, जिसमें आप अपना पूरा दिन निकाल देते हैं, उसमें ही आपको पूरी दुनिया का रस मैं दूं। हम सभी को नए शब्दों की जरूरत पड़ती रहती है, यह वजह है कि हर साल डिक्शनरी में सेल्फी जैसे नए शब्द बढ़ाते हैं। मगर, एक सच यह भी है कि वास्तव में हमने शब्दों के मायने गिराए हैं और भाषा में इनके सही अर्थों को कमजोर कर इसके इस्तेमाल को बिगाड़ा है।

भोपाल में 1972 पतरस के मजमीन को पेश करेंगे : थिएटर आर्टिस्ट और स्टोरी टेलर केसी शंकर ने बताया कि, थिएटर के दौरान मुझे जब हिंदुस्तानी साहित्य से मुखातिब होने का मौका मिला, उस वक्त सही मायने में मेरी हिंदुस्तानी साहित्य से दोस्ती हुई। इन कहानियों को लोगों को अासानी से पहुंचाने का जरिया मुझे स्टोरी टेलिंग लगा, जिसमें मुझे किसी तरह की खास लाइटों, स्टेज, प्रॉपर्टीज जैसे टूल्स की जरूरत नहीं पड़ती, आप खुद में ही संपूर्ण थिएटर होते हैं। इस काम में मेरे साथ थिएटर कर रहे कुछ साथी कलाकार भी आए, हम सभी ने कहानियों को बार-बार पढ़ा, हर महीने एक राइटर को लेते और उनकी छह कहानियों को तैयार करते। अब हम सभी के पास 3 से 4 कहानियां हैं, जिन्हें हम अपने अंदाज में सुनाते हैं। भोपाल में मैं पतरस बुखारी द्वारा लिखे गए 1972 पतरस के मजमीन को पेश करूंगा, जो उर्दू भाषा में लिखा गया पहला ह्यूमर था। इस कहानी में लोगों को दुश्मन सरीखे ऐसे दोस्त मिर्जा साहब से मुलाकात करने का मौका मिलेगा, जिनके कारनामों से बार-बार यह दोस्ती गहरी होती जाती है। साथ ही, भोपाल में विक्की आहुजा हरिशंकर परसाई का पुलिस के करप्शन पर लिखा सटायर पेश करने वाले हैं, जो यह बताएगा कि यहां की पुलिस कितनी तेज है कि चांद पर भी गई तो वहां की सरकार को भी यहां सी शिक्षा दे आई।

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