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भूतपूर्व सैनिक खेती के लिए जमीन मांग रहे, लेकिन पेंशन ‌Rs.350 से ज्यादा इसलिए 10 साल से अटका आवंटन

बैरसिया तहसील के ललरिया गांव के भूतपूर्व सैनिक खालिद खान पिछले छह साल से राज्य सरकार से अपनी आजीविका के लिए पट्टे...

Dainik Bhaskar

May 17, 2018, 04:20 AM IST
भूतपूर्व सैनिक खेती के लिए जमीन मांग रहे, लेकिन पेंशन ‌Rs.350 से ज्यादा इसलिए 10 साल से अटका आवंटन
बैरसिया तहसील के ललरिया गांव के भूतपूर्व सैनिक खालिद खान पिछले छह साल से राज्य सरकार से अपनी आजीविका के लिए पट्टे पर कृषि भूमि दिए जाने की मांग कर रहे हैं। खालिद भूमिहीन हैं, और गांव में कृषि योग्य खाली जमीन भी उपलब्ध है। लेकिन 35 साल पुराने एक बेअसर हो चुके नियम में संशोधन नहीं हो पाने के कारण प्रदेश में खालिद जैसे हजारों भूमिहीन सैनिकों को खेती के लिए जमीन के पट्‌टे नहीं मिल पा रहे हैं। प्रदेश सरकार ने रिटायर्ड भूमिहीन सैनिकों को पट्‌टे पर खेती की जमीन देने का नियम 1983 में बनाया था। इसमें जमीन आवंटन के लिए पेंशन राशि 350 रुपए से कम होने का प्रावधान है। वर्तमान दौर में महंगाई और मुद्रा स्फीति के कारण चपरासी की पेंशन भी 10 हजार रुपए से अधिक होती है। लेकिन बदले हालात के बीच बेअसर हो चुके इस नियम के कारण पिछले एक दशक से प्रदेश में किसी भी भूमिहीन सैनिक को जमीन नहीं दी जा सकी है।

कृृषि भूमि पाने छह साल से भटक रहे हैं बैरसिया के ललरिया गांव के रिटायर्ड सैनिक खालिद खान

पूर्व सैनिक- खैरात नहीं मांग रहे, एसडीएम बोले-शासन से मार्गदर्शन मांगा है

संशोधन नहीं हो पा रहा

1983 में बना था नियम, अधिकतम 350 रुपए पेंशन पाने वाले होंगे अपात्र की श्रेणी में

08 हजार रुपए से 20 हजार के बीच है सैनिकों की न्यूनतम पेंशन, इसलिए भटक रहे हैं हजारों सैनिक

साढ़े चार साल हो गए हैं, लेकिन प्रशासन न तो मेरे आवेदन को खारिज कर रहा है, न ही जमीन आवंटन का आदेश जारी किया जा रहा है। आज की तारीख में 350 रुपए से कम पेंशन तो चौकीदार और चपरासी तक को नहीं मिलती, जबकि मैं तो रिटायर्ड फौजी हूं। मैं सरकार से कोई खैरात नहीं मांग रहा हूं। यदि सैनिकों को जमीन देना ही नहीं हैं तो वाहवाही लूटने के लिए ऐसे नियम बना ही क्यों रखे हैं। - खालिद खान, भूतपूर्व सैनिक, ललरिया

पेंडिंग... 3.5 साल से बैरसिया एसडीएम कोर्ट में लंबित है जमीन आवंटन का प्रकरण

48 वर्ष के खालिद 31 मार्च 2013 को 19-आर्म्ड रेजीमेंट से रिटायर होकर गांव लौटे थे। 24 साल की उम्र में सेना में भर्ती हुए खालिद ने 20 साल सर्विस की। परिवार भूमिहीन है, इसलिए बंटाई पर दूसरों की जमीन पर खेती करते हैं। साढ़े तीन साल से उनका प्रकरण बैरसिया एसडीएम के राजस्व कोर्ट में लंबित है। वर्ष 2012 में जिला सैनिक कल्याण बोर्ड के माध्यम से उन्होंने जमीन दिलाने की मांग शासन से की। जिला प्रशासन ने बैरसिया तहसील को यह प्रकरण सौंप दिया। जमीन की तलाश कर ली गई। लेकिन वर्ष 2015 से जमीन आवंटन का प्रकरण बैरसिया एसडीएम कोर्ट में लंबित है। लेकिन साढ़े तीन साल बीतने के बावजूद प्रशासन उनके प्रकरण को न तो खारिज कर पा रहा है, न ही उन्हें जमीन के पट्‌टे का आदेश कर पा रहा है।

खालिद खान को जमीन आवंटन का मामला 2015 से राजस्व न्यायालय में लंबित हैं, उनकी पेंशन 16 हजार रुपए है। जबकि जिस सैनिक की पेंशन 350 रुपए से ज्यादा है, वह जमीन के लिए पात्र ही नहीं हैं। यह प्रावधान काफी पुराना है, इसलिए राज्य शासन से मार्गदर्शन मांगा है। लेकिन शासन से अब तक हमें कोई निर्देश नहीं मिले हैं। - राजीव नंदन श्रीवास्तव, एसडीएम बैरसिया

सरकारी पत्र...संभागायुक्त ने 9 माह पहले लिखा था प्रमुख सचिव राजस्व को पत्र

संभागायुक्त अजात शत्रु श्रीवास्तव ने पिछले साल 30 अगस्त 2017 को राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर 1983 में बने भूमिहीन सैनिकों को जमीन का पट्‌टा देने के नियम में संशोधन करने की सिफारिश की है। इसमें कहा गया है कि राजस्व पुस्तक परिपत्र खंड चार क्रमांक 3 में कृषि प्रयोजनों के लिए सरकारी भूमि के बंटान का प्रावधान है। इस परिपत्र की कंडिका-3 (क) (ख) में भूतपूर्व सैनिक की परिभाषा में लिखा गया है कि “जिसकी मासिक पेंशन 325 रुपए से अधिक न हो, उनको ही भूमि आवंटन की पात्रता होगी। लेकिन वर्तमान में किसी भी सैनिक की पेंशन 8 हजार और 20 हजार रुपए से कम नहीं है। इस कारण किसी भी भूतपूर्व सैनिक को सरकारी जमीन की पात्रता ही समाप्त हो गई है। राज्य सरकार का 325 रुपए की पेंशन का परिपत्र 35 साल पुराना है, इसलिए अब इसमें संशोधन किए जाने की जरूरत है।

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