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लालबत्तियों से छुटकारा मिला मगर ‘वीआईपी’ अब भी सड़कों पर परेशानी का सबब

लबत्ती खत्म हो चुकी हैं, लेकिन वीआईपी कल्चर कायम है। पिछले साल एक मई को केंद्र सरकार ने मंत्रियों के वाहनों से...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 17, 2018, 04:20 AM IST

लालबत्तियों से छुटकारा मिला मगर ‘वीआईपी’ अब भी सड़कों पर परेशानी का सबब
लबत्ती खत्म हो चुकी हैं, लेकिन वीआईपी कल्चर कायम है। पिछले साल एक मई को केंद्र सरकार ने मंत्रियों के वाहनों से लालबत्ती और अफसरों की गाड़ियों से पीली बत्ती हटाने का फरमान सुनाया था तो उम्मीद बंधी थी कि अब हमें बिला वजह के ठसके भरे जलवे से राहत मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। बड़े आदमी यानी हुक्मरां अपने को आम नागरिक से कहीं ऊपर और बेहतर समझते हैं। सारी सुविधाओं पर अपना पहला हक समझते हैं, वे किसी के साथ कैसा भी व्यवहार कर सकते हैं। हुजूर, ये तो गलत बात है। ट्रैफिक को ही लीजिए। पारंपरिक तौर-तरीकों के चलते वीआईपी मूवमेंट के नाम पर ट्रैफिक को रोकना भी बड़ा दिखावा बना है। ये व्यवहार शहर में बदस्तूर जारी है। इसमें सामंतशाही की झलक नजर आती है। ऐसा ही कुछ नजारा बुधवार को उपराष्ट्रपति के आगमन के दौरान देखने को मिला। इसके पहले राष्ट्रपति के आगमन के समय भी ट्रैफिक को रोका गया था। वैसे भोपाल में तो ये रिवायत काफी पुरानी है। उन्हें तो कोई फर्क नहीं पड़ता, वे तो तय वक्त पर जहां जाना है, वहां पहुंच जाते हैं, लेकिन खमियाजा पब्लिक को उठाना पड़ता है। ऐसे में जाम के चलते एम्बुलेंस फंसे, किसी की फ्लाइट या ट्रेन छूटे। आदमी तो आम है। ऐसे में गजलकार दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां याद आती हैं- ‘वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है, माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है, सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर, झोले में उसके पास कोई संविधान है।’

सवाल यह है कि वीवीआईपी या वीआईपी के काफिले के गुजरते समय ट्रैफिक को रोका जाना या उसे डायवर्ट करने का फैसला कितना सही है? यह फैसला सीधे तौर पर नागरिक अधिकारों का हनन है, लेकिन अफसोस नागरिक अधिकारों के संरक्षण के लिए गठित मप्र मानव अधिकार आयोग की भी दृष्टि इस मुद्दे पर नहीं है। ट्रैफिक रोके जाने पर प्रशासन और पुलिस का दावा वीवीआईपी की सुरक्षा को लेकर हो सकता है। यद्यपि पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, लेकिन उसे यह अधिकार नहीं है कि इसका किसी भी तरह से गलत इस्तेमाल करे। यह नहीं भूलना चाहिए कि जाम में फंसी गाड़ियों की वजह से प्रदूषण भी बढ़ता है। वीआईपी सिक्योरिटी के लिए और भी कुछ उपाय हो सकते हैं। जैसे ट्रैफिक रोकने के बदले वीवीआईपी को एयरपोर्ट से हेलिकॉप्टर द्वारा मोतीलाल नेहरू स्टेडियम, जंबूरी मैदान, भेल दशहरा मैदान लाया जा सकता है, ताकि एयरपोर्ट से लेकर शहर के भीतर का ट्रैफिक न रोकना पड़े और रूट डायवर्ट करने की भी नौबत न आए। इसी तरह वीवीआईपी को दिन के बदले सुबह या देर शाम को भोपाल आने की बात कही जा सकती है। इस दौरान उनके आयोजन हो सकते हैं। भोपाल में हेलिकॉप्टर उतारने के लिए कई स्थानों पर खुली जगह भी हैं। ऐसे भी कुछ उदाहरण हैं कि राजनेता एयरपोर्ट पर विमान से उतरने के बाद हेलिकॉप्टर से मोतीलाल नेहरू स्टेडियम, जंबूरी मैदान में उतरे हैं, लेकिन सोच और नजरिए का सवाल है?

प्रसंगवश: तत्कालीन कलेक्टर एसके वशिष्ठ ने राजनीतिक दलों और सामाजिक, धार्मिक संगठनों से सलाह-मशविरा कर विरोध दर्ज कराने की समय अवधि की अनिवार्यता को अमल में लाने की कोशिश की ताकि लंबी अवधि के बदले महज दो घंटे में आयोजन खत्म हो जाए। तब नीलम पार्क, यादगार-ए-शाहजहांनी पार्क जुलूस-जलसे के लिए आरक्षित किया, लेकिन बाद में विरोध होने पर उन्होंने टीनशेड में धरना देने और प्रदर्शन करने का स्थान तय कर दिया, लेकिन उनके जाने के बाद सब कुछ बदल गया। उम्मीद है कि शहर के प्रशासनिक मुखिया इस बारे में जरूर सोचेंगे और वाजिब निर्णय लेंगे। Áअलीम बजमी

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