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भोपाल. उपेक्षा से नाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की जयंती पर कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। माना जा रहा है कि वे भाजपा में शामिल हो जाएंगे। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया ने पहला चुनाव जनसंघ से लड़ा था। शुरुआत में जनसंघ के टिकट से चुनाव लड़ने के बाद वो कांग्रेस में शामिल हो गए।
ज्योतिरादित्य ने 2002 में पहली बार पिता के देहांत के बाद उनकी पारंपरिक गुना सीट से उपचुनाव लड़ा और लोकसभा पहुंचे। 2004 में भी उन्होंने इसी सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इसके बाद वह 2009 और 2014 से गुना से लोकसभा पहुंचे। लेकिन, 2019 में वो अपनी इस सीट से चुनाव हार गए। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 2007 में पहली बार केंद्रीय राज्यमंत्री के रूप में मनमोहन सरकार में जिम्मा संभाला। इसके बाद 2012 में भी वो केंद्रीय राज्य मंत्री रहे। 2019 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद पार्टी ने उन्हें मध्यप्रदेश में कोई बड़ा पद देने की बजाय कांग्रेस महासचिव बना दिया। राज्य के विधानसभा चुनाव में सिंधिया को मुख्यमंत्री का चेहरा माना जा रहा था लेकिन नतीजों के बाद कमलनाथ मुख्यमंत्री बन गए।
1993 में पिता माधवराव भी कांग्रेस से अलग हुए थे
जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़ रहे हैं, वैसे ही साल 1993 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया, दिग्विजय सिंह से अलग हो गए थे। उस दौर में माधवराव भी कांग्रेस में उपेक्षित महसूस कर रहे थे। इसी के चलते उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया था। बाद में उन्हीं के नेतृत्व में मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस पार्टी बनाई गई, हालांकि कुछ समय बाद माधवराव सिंधिया कांग्रेस में लौट आए थे। ठीक इसी प्रकार 1967 में जब मध्य प्रदेश में डीपी मिश्रा की सरकार थी, तब कांग्रेस में उपेक्षित होकर राजमाता विजयराजे सिंधिया कांग्रेस छोड़कर जनसंघ से जुड़ गई थीं। राजमाता ने जनसंघ के टिकट पर ही गुना लोकसभा सीट से चुनाव भी जीता था।
माधवराव ने जनसंघ से जीता था पहला चुनाव
1971 में विजयाराजे के बेटे माधवराव सिंधिया जनसंघ के टिकट पर गुना से जीत हासिल की। 1977 के चुनाव में वह यहां से निर्दलीय लड़े और 80 हजार वोटों से भारतीय लोकदल के गुरुबख्स सिंह को हराया। 1980 में कांग्रेस के टिकट पर यहां से जीते। 1984 में माधवराव ग्वालियर से चुनाव लड़े और गुना से कांग्रेस ने महेंद्र सिंह को टिकट दिया। उन्होंने भाजपा के उद्धव सिंह को हराया। 1989 में यहां से विजयाराजे सिंधिया एक बार फिर यहां से लड़ीं और तब के कांग्रेस के सांसद महेंद्र सिंह को शिकस्त दी। इसके बाद लगातार विजियाराते चार चुनाव यहां से जीतीं। विजियाराजे के निधन के बाद माधवराव सिंधिया यहां से चुनाव लड़े और जीते।
माधवराव के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया
2001 में माधवराव सिंधिया के निधन के बाद 2002 में हुए उपचुनाव में उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया यहां से लड़े। ज्योतिरादित्य 2002 से 2014 के बीच हुए सभी लोकसभा चुनाव में जीते। इस सीट से कांग्रेस जहां 9 बार जीत दर्ज कर चुकी है तो ये सीट जनसंघ की झोली में 4 बार ये सीट गई है। 1 बार जनसंघ को यहां से जीत मिली है। भाजपा इस सीट पर तभी जीत सकी है जब जब विजयाराजे सिंधिया उसके टिकट पर चुनाव लड़ीं।
ज्योतिरादित्य को विरासत में मिली राजनीति
ज्योतिरादित्य सिंधिया का जन्म 1 जनवरी 1971 को मुंबई में हुआ था और उन्होंने 1993 में हाॅवर्ड यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र की डिग्री ली। इसके बाद 2001 में उन्होंने स्टैनफोर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस से एमबीए किया। ज्योतिरादित्य की 1984 में बड़ौदा के गायकवाड़ घराने की प्रियदर्शिनी से शादी हुई है और उनके एक बेटा महा आर्यमान और बेटी अनन्याराजे हैं। राजनीति उन्हें विरासत में मिली, क्योंकि पिता स्व. माधवराव सिंधिया अपने समय के दिग्गज कांग्रेस नेता रहे। ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआएं भी राजनीती में सक्रिय हैं। उनके पिता स्व. माधवराव संधिया 9 बार सांसद रहे थे।
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