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  • The Lost Megha oxygen returned to Death Zone by defeating Everest; said she was the most precious breath of life

मप्र / एवरेस्ट फतह करने वालीं मेघा की डेथ जोन में खत्म हो गई थी ऑक्सीजन; जान बची तो बोलीं- ये सबसे कीमती सांस



सीहोर की मेघा परमार ने एवरेस्ट फतह कर मप्र की तरफ से फहराया तिरंगा। सीहोर की मेघा परमार ने एवरेस्ट फतह कर मप्र की तरफ से फहराया तिरंगा।
मेघा ने बताया कि एवरेस्ट फतह करने के बाद जब वह लौटीं तो उनकी ऑक्सीजन डेथ जोन में आकर खत्म हो गई थी। मेघा ने बताया कि एवरेस्ट फतह करने के बाद जब वह लौटीं तो उनकी ऑक्सीजन डेथ जोन में आकर खत्म हो गई थी।
दूसरे पर्वतारोहियों से उन्हें ऑक्सीजन सिलेंडर मिला तब सांस में सांस आई। दूसरे पर्वतारोहियों से उन्हें ऑक्सीजन सिलेंडर मिला तब सांस में सांस आई।
मेघा परमार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर। मेघा परमार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर।
मेघा दैनिक भास्कर के दफ्तर आईं और अपनी कहानी सुनाई। मेघा दैनिक भास्कर के दफ्तर आईं और अपनी कहानी सुनाई।
मेघा ऐसा करने वाली प्रदेश की पहली महिला पर्वतारोही हैं। मेघा ऐसा करने वाली प्रदेश की पहली महिला पर्वतारोही हैं।
उन्होंने भास्कर दफ्तर में एवरेस्ट फतह के किस्से सुनाए। उन्होंने भास्कर दफ्तर में एवरेस्ट फतह के किस्से सुनाए।
अपने कोच के साथ मेघा परमार। अपने कोच के साथ मेघा परमार।
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सीहोर की मेघा परमार ने एवरेस्ट फतह कर मप्र की तरफ से फहराया तिरंगा।सीहोर की मेघा परमार ने एवरेस्ट फतह कर मप्र की तरफ से फहराया तिरंगा।
मेघा ने बताया कि एवरेस्ट फतह करने के बाद जब वह लौटीं तो उनकी ऑक्सीजन डेथ जोन में आकर खत्म हो गई थी।मेघा ने बताया कि एवरेस्ट फतह करने के बाद जब वह लौटीं तो उनकी ऑक्सीजन डेथ जोन में आकर खत्म हो गई थी।
दूसरे पर्वतारोहियों से उन्हें ऑक्सीजन सिलेंडर मिला तब सांस में सांस आई।दूसरे पर्वतारोहियों से उन्हें ऑक्सीजन सिलेंडर मिला तब सांस में सांस आई।
मेघा परमार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर।मेघा परमार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर।
मेघा दैनिक भास्कर के दफ्तर आईं और अपनी कहानी सुनाई।मेघा दैनिक भास्कर के दफ्तर आईं और अपनी कहानी सुनाई।
मेघा ऐसा करने वाली प्रदेश की पहली महिला पर्वतारोही हैं।मेघा ऐसा करने वाली प्रदेश की पहली महिला पर्वतारोही हैं।
उन्होंने भास्कर दफ्तर में एवरेस्ट फतह के किस्से सुनाए।उन्होंने भास्कर दफ्तर में एवरेस्ट फतह के किस्से सुनाए।
अपने कोच के साथ मेघा परमार।अपने कोच के साथ मेघा परमार।

  • मेघा की कैंप-4 यानि डेथ जोन में आकर ऑक्सीनज खत्म हो गई और दूसरे पर्वतारोही के सिलेंडर से ऑक्सीजन ली
  • सीहोर की मेघा प्रदेश की दूसरी महिला पर्वतारोही, जिसने छिंदवाड़ा की भावना डेहरिया के साथ एवरेस्ट फतह की 
  • मेघा परमार ने दैनिक भास्कर के साथ शेयर की, एवरेस्ट फतह की कहानी 

Dainik Bhaskar

Jun 01, 2019, 04:01 PM IST

भोपाल. शब्दों में बयां करना मुश्किल है पर जब मैं टॉप पर पहुंची तो शरीर थका हुआ था और भोर हो रही थी। इंद्रधनुष हम यहां थोड़ा सा देखते हैं, वहां चारों तरफ इंद्रधनुष के रंग बिखरे थे। मुझे एहसास हुआ मैं दुनिया की सबसे ऊंची जगह पर हूं और उससे ऊपर सिर्फ आसमान और भगवान है, इसके अलावा कुछ नहीं। कहा जाता है दुनिया गोल है, ऊपर जाकर पता चलता है कि दुनिया वाकई गोल है।

 

 

चोटी पर पहुंचकर सबसे पहले मेरे भगवानजी को याद किया। मैं सीहोर वाले बप्पा जी और भोलेनाथ को मानती हूं। पूरे रास्ते यही बोलते हुए गई थी- भगवान जी थोड़ी सी शक्ति दे दो...। जिन्होंने मुझे सपोर्ट किया था, आंखें बंद कर उन्हें याद किया। समिट का फोटो और वीडियो लिया। 

 

एवरेस्ट हर पल आपका टेस्ट लेता है, आपको चैलेंज करता है। माइनस 60 डिग्री तापमान में 40-50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाएं शरीर को चीर रही थीं। इस सफर में मौत मुझे छूकर निकली है, यमराज जी ने हाथ पकड़ लिया था। सबकी दुआएं थीं जो उन्होंने छोड़ दिया। उस दिन ट्रैफिक बहुत ज्यादा था तो उतरते वक्त हमें एक ही जगह 3 घंटे रुकना पड़ा। मेरा ऑक्सीजन धीरे-धीरे खत्म हो रहा था, बहुत कम टाइम में नीचे जाना था, नहीं तो ऑक्सीजन खत्म होने पर वहीं खड़े-खड़े मर जाते।

 

कैंप-4 में पांच लोगों की डेडबॉडी देखीं : कैंप-4 पहुंचकर पता चला- पांच लोगों की मौत हो चुकी है, जिसमें दो इंडियंस है। लेकिन मुझे यह तो पता था कि मैं जिंदा वापस जाऊंगी। मैंने उतरते वक्त कई जगहों पर स्लीपिंग बैग्स रखे देखे। अपने शेरपा से पूछा इतने सारे स्लीपिंग बैग्स यूं ही बेकार क्यों पड़े हैं। शेरपा ने बताया- वो स्लीपिंग बैग्स नहीं, लाशें हैं... उनकी जो इस सफर को पूरा नहीं कर पाए। 

 

डेथ जोन का चैलेंज और फतह : कैम्प-4 से कैम्प-3 तक का रास्ता डेथ जोन कहलाता है। सबसे ज्यादा मौत यहीं होती है। ऑक्सीजन खत्म होने से ऐसा लग रहा था, जैसे कोई गला दब रहा है। शेरपा ने दूसरे शेरपा से किसी का सिलेंडर मांगा, जो समिट पूरा नहीं कर पाया था और नीचे कैम्प में ही रुक गया था। उस सिलेंडर से मैंने गहरी सांस ली... वो मेरी जिंदगी की सबसे कीमती सांस थी। डेथ जोन के पूरे रास्ते में मुझे दिखाई देना बंद हो गया था, क्योंकि मेरे सनग्लासेस गिर गए थे। मैं सिर्फ दम से पैर जमाकर आगे बढ़ती रही, मेरा शेरपा निम्मा नूरू कहता रहा- बहिनी... रुकना नहीं है। मुझे नहीं पता था कि मुझमें इतनी शक्ति है। दो दिन बाद मैं ठीक से देख पा रही थी। 

 

मां कहती है- दूसरी बेटी भेज दी : मैं जल्द गुस्से में आ जाती थी। इस उपलब्धि ने मुझे विनम्र बनाया है। मां तो कहती है- मेरी बेटी को ले गए थे, अब कोई दूसरी ही बेटी भेज दी है। मैंने फैसला लेना सीखा है। साथ ही तय किया है कि प्लांटेशन करूंगी, जिंदा रखूंगी पेड़-पौधों को और यह कोई नेताओं वाला वादा नहीं है, क्योंकि ऑक्सीजन की कीमत मुझसे बेहतर कौन जानता होगा। मनाली में रीढ़ की हड्‌डी में तीन फ्रैक्चर आने के बाद पापा ने बातचीत बंद कर दी थी। अब बातचीत शुरू हुई है। 

 

अब अब आगे क्या : सीहोर की 24 साल की मेघा परमार ने 22 मई सुबह 5.30 बजे माउंट एवरेस्ट के शिखर पर कदम रखे। मेघा के पिता दामोदर परमार किसान हैं , मां मंजू हाउसवाइफ हैं। सिक्किम में माउंट जंक्शन और अफ्रीका में माउंट किलिमंजारो फतह करने का इरादा है। 

 

हिलेरी स्टेप पर एक मुलाकात : मेघा जब शिखर छूकर नीचे की ओर उतर रही थीं तो हिलेरी स्टेप पर उनकी मुलाकात ऊपर की ओर चढ़ती भावना से हुई। भावना ने मेघा को मिशन कामयाब होने पर बधाई दी तो मेघा ने भी उन्हें उनकी बची हुई यात्रा के लिए शुभकामनाएं दीं। 

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