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माउंट एवरेस्ट फतह लौटीं भावना; बोलीं- अब सात महाद्वीपों की सात सबसे उंची चोटी छूना चाहती हूं

एक वर्ष पहले
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छिंदवाड़ा की भावना डेहरिया ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट को फतह किया।
  • बोलीं- एवरेस्ट के रास्ते में खराब हो गया था ऑक्सीजन सिलेंडर का रेगुलेटर, लेकिन इस वजह से मैं मंजिल कैसे छोड़ देती 
  • ये रिस्की था क्योंकि ऑक्सीजन की वैल्यू तब पता चलती है जब एक मिनट के लिए सिलेंडर बंद हो जाए
  • भावना ने दैनिक भास्कर के साथ साझा की अपनी एवरेस्ट फतह करने की दास्तां 

भोपाल. पातालकोट में वर्ष 2009 में एक एडवेंचर कैंप लगा था। उसमें कई पर्वतारोही आए थे। माउंट एवरेस्ट फतह करने के मेरे सपने ने उसी दिन जन्म लिया और अब 10 साल बाद वह सपना सच हो गया। 22 मई को सुबह करीब 9.30 बजे जब मैं दुनिया के शिखर पर थी तो मुझे वही एडवेंचर कैंप याद आया।

 

 

सामने छोटे-छोटे पहाड़ थे, माइनस 40 डिग्री तापमान था और हड्डियां गलाने वाली ठंड थी। मैं वहां 10-15 मिनट रुकी। उन सबको मन ही मन याद किया जिन्होंने इस सफर में मेरा अब तक साथ दिया था। इसका बहुत सारा श्रेय मेरे पेरेंट्स को जाता है, जिन्होंने कभी मुझे हार नहीं मानने दी। हमेशा कहते थे- जो मन में है वो कर डालो। 

 

लाशों ने मुझे सतर्क कर दिया 
20 मई को कैंप-3 से कैंप-4 के सफर के दौरान मुझे दो पर्वतारोहियों की लाशें रास्ते में दिखीं। उनको देखकर घबराहट हुई। मैंने सोचा- पता नहीं इनके साथ क्या हुआ होगा, पर मुझे सतर्क रहना है। माउंट एवरेस्ट वहीं रहेगा, मेरा सपना भी जिंदा रहेगा, लेकिन तभी जब मैं जिंदा रहूंगी और जिंदा रही तो दोबारा आ जाऊंगी। उतनी ऊंचाई पर कई बार दिमाग काम नहीं करता। ध्यान रखना होता है कि जल्दबाजी में कोई फैसला न लें। यह बात मैं खुद को समझाती रही। जैसे- एक सेल्फ एंकर होता है, जिसे बांधना होता है... यह सबसे छोटी चीज होती है, लेकिन ध्यान नहीं रखो तो यही सबसे बड़ी चूक बन सकती है और हजारों फीट गहरी खाई में गिर सकते हो। 

 

डेथ जोन पर डेढ़ घंटे तक अटकी रही 

कैंप-4 से शिखर के रास्ते में एक जगह आती है, जिसे बालकनी कहते हैं। यहां पर्वतारोही थोड़ा आराम करते हैं, अपने सिलेंडर और इक्विप्मेंट चेक करते हैं। यहां मेरे ऑक्सीजन सिलेंडर का रेगुलेटर खराब हो गया। इस वजह से मैं माइनस 35 डिग्री तापमान पर यहां डेढ़ घंटे के लिए अटक गई। अपने हाथ-पैर लगातार हिलाती रही, ताकि फ्रॉस्ट बाइट न हो। शेरपा ने कहा- समिट नहीं कर सकते, नीचे जाना पड़ेगा। मैं खुद को फिजिकली फिट महसूस कर रही थी, तो मैंने सोचा एक रेगुलेटर की वजह से मैं इतने करीब आकर यह समिट क्यों छोड़ दूं। शेरपा रेगुलेटर लेकर नीचे गया और मैं लीक सिलेंडर लेकर ऊपर। हालांकि आधे घंटे बाद ही मैंने अपने शेरपा को पीछे आते देखा तो जान में जान आ गई। 

 

मेंटल से ज्यादा फिजिकल गेम 
अभी पूरे मध्यप्रदेश में नाम हो रहा है। गांववाले बधाई दे रहे हैं। एवरेस्ट ने मुझे धैर्य सिखाया है। वहां जाकर मैंने समझा है कि जिंदगी की कीमत क्या है। ऑक्सीजन की वैल्यू तब पता चलती है जब एक मिनट के लिए सिलेंडर बंद हो जाए। एवरेस्ट ने मुझे सिखाया कि यह फिजिकल गेम तो है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा मेंटल टफनेस की गेम है। आपका टारगेट फिक्स है तो आपको कोई हरा नहीं सकता। मैंने अपने अनुभव से जाना है कि अगर आपने जिंदगी में कहीं भी स्ट्रगल किया है तो उसका लाख गुना ज्यादा पाओगे। 

 

आगे क्या : सात महाद्वीपों की सात सबसे उंची चोटी फतह करना चाहती हैं, माउंट एवरेस्ट कर लिया है। 
कौन हैं भावना : भावना डेहरिया, तामिया, जिला छिंदवाड़ा की रहने वाली हैं और भोपाल से एमपीएड की पढ़ाई कर रही हैं। पिता मुन्नालाल टीचर हैं, मां उमा देवी सोशल वर्कर। 

 

हिलेरी स्टेप पर एक मुलाकात 
मेघा जब शिखर छूकर नीचे की ओर उतर रही थीं तो हिलेरी स्टेप पर उनकी मुलाकात ऊपर की ओर चढ़ती भावना से हुई। भावना ने मेघा को मिशन कामयाब होने पर बधाई दी तो मेघा ने भी उन्हें उनकी बची हुई यात्रा के लिए शुभकामनाएं दीं।

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