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मध्यप्रदेश / जो प्रत्याशी यहां चुनाव हारा, उसे राजनीति में अच्छा ओहदा मिला



Myths are discussed in mp assembly elections
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Myths are discussed in mp assembly elections

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2018, 03:02 AM IST

सुनील यादव, मंडीदीप. चुनावों के पहले मिथक की खासी चर्चा रहती है। रायसेन जिले से यह मिथक जुड़ा है कि जो प्रभारी मंत्री बनता है उसे अपनी सीट गंवानी पड़ती है तो वहीं इसी जिले की भोजपुर विधानसभा से एक बहुत रोचक संयोग भी जुड़ा है। संयोग यह कि जो भी प्रत्याशी इस सीट से चुनाव हारता है, उसे राजनीति में अच्छा ओहदा मिल जाता है।

 

यानि वह अपनी पार्टी में कोई न कोई महत्वपूर्ण पद पा जाता है। इस सुखद संयोग की वजह से भोजपुर विधानसभा की जिले में नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में विशेष पहचान बन गई है। वर्ष 1980 से 2013 के बीच विधानसभा के 8 चुनाव और दो उपचुनाव हुए। इनमें से यदि दो उपचुनावों को छोड़ दें तो आठ चुनावों के हारे हुए प्रत्याशियों में से एक राजेश पटेल को छोड़कर शेष सात हारे हुए प्रत्याशियों को शिव की विशेष कृपा प्राप्त हुई है।  

 

भोजपुर विधानसभा सीट वर्ष 1967 में अस्तित्व में आई।  तब से अब तक यहां कुल 11 विधानसभा चुनाव और दो उपचुनाव संपन्न हुए हैं। 1980 में जनता पार्टी के उम्मीदवार शालीगराम श्रीवास्तव के मुकाबले कांग्रेस ने असलम शेर खान को मैदान में उतारा। असलम चुनाव हार गए, लेकिन वे 1985 में बैतूल से सांसद बने। इसी प्रकार कांग्रेस ने 1985 में अकबर खान को भाजपा के वरिष्ठ नेता सुंदरलाल पटवा के सामने उतारा।

 

जिसमें पटवा विजयी हुए, लेकिन अकबर खान 1986 में मंडीदीप साडा के अध्यक्ष चुने गए। 1990 के विस चुनाव में सुंदरलाल पटवा के सामने कांग्रेस के राजकुमार पटेल ने चुनाव लड़ा और उन्हें भी हार मिली। तीन साल बाद 1993 में पटेल दिग्विजय सरकार में मंत्री बने और 2009 में भाजपा की वरिष्ठ नेत्री सुषमा स्वराज के सामने लोकसभा का टिकट भी मिला।

1993 के चुनाव में पटवा के सामने अजय सिंह को कांग्रेस ने प्रत्याशी बनाया। उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन वे भी 1998 में चुनी गई दिग्विजय सरकार में मंत्री बनाए गए। 2003 में उमा भारती की सरकार आने पर कांग्रेस ने अजय को पदोन्नत कर नेता प्रतिपक्ष का जिम्मा सौंपा। अजय सिंह दो बार नेता प्रतिपक्ष बनने के साथ प्रदेश की राजनीति में बड़े नेता भई माने जाते हैं।

 

1998 के चुनाव में तीन बार से अजेय रहे पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के सामने कांग्रेस ने क्षेत्रीय नेता विजय धाकड़ को उतारा। इसमें भी पटवा के सिर एक बार फिर जीत का सेहरा बंधा। वहीं करारी शिकस्त मिलने के बाद धाकड़ को जिलाध्यक्ष की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई। 2003 के चुनाव में भोजपुर से भाजपा ने सुरेंद्र पटवा को अपना उम्मीदवार बनाया। उनका मुकाबला कांग्रेस के राजेश पटेल से हुआ। इस करीबी मुकाबले में पटवा को हार मिली, लेकिन पिछले 23 साल से चले आ रहे इस सुखद संयोग के चलते सुरेंद्र पटवा को 2008 में विधायक और 2013 में मंत्री बनने का मौका मिला।

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