मप्र / भोपाल के पास बनेगी देश की सबसे आधुनिक वायुमंडलीय प्रयोगशाला

National Atmospheric Research Laboratory
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National Atmospheric Research Laboratory

  • सेंट्रल इंडिया... भोपाल, नागपुर में है एस-बैंड रडार, आंधी, बारिश-तूफान की मिलेगी सटीक जानकारी

दैनिक भास्कर

Oct 10, 2019, 12:40 PM IST

भोपाल। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए भोपाल के नजदीक देश की अब तक की सबसे बड़ी और अत्याधुनिक वायुमंडलीय प्रयोगशाला स्थापित होगी। यह प्रयोगशाला सीधे पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी की निगरानी में स्थापित की जा रही है।

 

मध्यप्रदेश सरकार ने पिछले महीने राजाभोज एयरपोर्ट से 15 किलोमीटर दूर सीहोर के सीलखेड़ा गांव में 100 एकड़ जमीन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय को लीज पर दे दी है। 100 करोड़ से अधिक कीमत के 20 से अधिक अत्याधुनिक वैदर उपकरण यहां स्थापित किए जाएंगे। इसके लिए फिनलैंड से ड्वैल पोलर मैट्रिक सी-बैंड रडार आयात किए जा चुके हैं। 

 

इस प्रयोगशाला के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. कुंदन दानी के मुताबिक इस तरह की लैब के लिए सबसे मुफीद जगह मध्य भारत का क्षेत्र ही है, क्योंकि ऊपरी हवा के चक्रवात से लेकर लो प्रेशर एरिया (ट्रफ लाइन) भोपाल आसपास से ही गुजरती हैं। इस प्रयोग के सफल होने के बाद इस तरह की 5 प्रयोगशालाएं, भारत के उत्तर, दक्षिण पूर्व, पश्चिम और उत्तर पूर्वी हिस्से में बनाने का भी लक्ष्य है।


सेंट्रल इंडिया में दो ही स्थानों पर अभी रडार स्थापित हैं, भोपाल और नागपुर। दोनों ही एस-बैंड रडार हैं। यह सिर्फ क्लाउड इमेज (बादलों की स्थिति) बताने वाला रडार है। इससे ये तो पता चल जाता है कि बादल कहां-कहां मौजूद हैं और किस प्रकार के हैं। लेकिन इससे हेलस्ट्रोम (ओलावृष्टि) और हवा की गति और दिशा जिसके कारण बादलों का मूवमेंट होता है, उसकी कोई जानकारी नहीं मिल पाती है।

 

प्रयोगशाला की ये हैं 4 बड़ी खासियत

  • विंड प्रोफाइलर रडार: जमीन की सतह से आसमान में 12 किमी की ऊंचाई तक के बीच हवा की दिशा और गति दोनों की सटीक जानकारी देगा। इससे आंधी-तूफान का भी पूर्वानुमान जारी किया जा सकेगा।
  • केयू बैंड रडार : भारत में इस तरह के रडार का इस्तेमाल इसरो या एयरफोर्स ही करती है। उदाहरण के तौर पर 300 किमी दूर कोई मानसूनी सिस्टम मौजूद है, तो इस रडार से सटीक लोकेशन पता की जा सकती है। वह किस दिशा में आगे बढ़ रहा है यह भी पता हो सकता है।
  • सी- बैंड द्विध्रुवीय रडार : द्विध्रुवीय रडार है, जो वर्टिकल और परपेंडिकुलर दो तरह की विद्युत-चुंबकीय तरंगे (इलेक्ट्रोमैग्नेटिव वेव्स) छोड़ता है। इससे बादलों की पोजीशन और डेंसिटी दोनों का सटीक आकलन किया जा सकता है।
  • डिस्ट्रोमीटर: यह वर्षा दर मापने का सबसे आधुनिक उपकरण है। इसके जरिए बारिश के दौरान हवा में ही पानी की बूंदों को मापकर प्रति मिनट गिरे पानी का आकलन किया जा सकता है। इससे बारिश की मात्रा की सटीक जानकारी सामने आएगी।

 

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