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इतिहास को मूल, दृष्टि और परंपरा से समझने की जरूरत

जनजातीय संस्कृति और परंपराओं के जीवंत अध्याय को इतिहास के रूप में नहीं समझा जा सकता। इतिहास की पश्चिमी दृष्टि में...

Danik Bhaskar | Sep 12, 2018, 02:10 AM IST
जनजातीय संस्कृति और परंपराओं के जीवंत अध्याय को इतिहास के रूप में नहीं समझा जा सकता। इतिहास की पश्चिमी दृष्टि में जीवन के सार को दर्ज करने की बजाय समय को महत्व दिया जाता है। हमारे भारत का इतिहास लेखन पश्चिम दृष्टि से लिखा गया, जो विभेदकारी है। यह कहना है लोककला एवं जनजातीय अध्येता डॉ. कपिल तिवारी का। वे मंगलवार को मेपकास्ट परिसर में शुरू हुई दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता शामिल थे।

उन्होंने कहा कि पश्चिमी शैली से लिखे भारत के इतिहास ने हममें अपने से ही ग्लानि पैदा कर दी है। आज इतिहास को भारत के मूल, दृष्टि, परंपरा से समझने की जरूरत है। भारत की परंपरा को अपनी आंखों से देखने की जरूरत है। स्थानीय व जनपदीय परंपराओं के समझे बिना भारत मे इतिहास की कल्पना असंभव है।

मेपकास्ट में शुरू हुई दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. कपिल तिवारी ने कहा

@ MPCST

परंपराएं फली-फूली लेकिन पैदा हुए भ्रम

दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ. मुकेश मिश्रा ने कहा कि मध्यवर्ती भारत समरस, अनूठा, सकारात्मक और विविधताओं से भरा क्षेत्र रहा है। यहां विविध परंपराएं फली-फूली, लेकिन समय के साथ अनेक भ्रम उत्पन्न हो जाते हैं और तथ्यों से छेड़छाड़ हो जाती है।

आज भी हमारी संस्कृति बदली नहीं

इतिहासकार डॉ. हंसा व्यास ने कहा के जींस और पश्चिमी गानों को अपनाने के बाद भी आज लड़कियां मंदिरों में जाती हैं। ये दर्शाता है कि आज भी हमारी संस्कृति नहीं बदली। संस्कृति के आयाम बदले है लेकिन मूल पूजा पद्धति में परिवर्तन नहीं हुआ। डॉ. नारायण व्यास ने शैल चित्रों के बारे में बताया।

आज की गतिविधियां कल की संस्कृति

"मध्यवर्ती क्षेत्र की राजनीतिक निरंतरता व सांस्कृतिक स्वरूप का विश्लेषण' पर रानी दुर्गावती विवि के प्राध्यापक डॉ. एसएन मिश्र ने कहा कि आज जो गतिविधियां हैं, वो आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कृति होगी।