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सैटेलाइट टाउन से शहर को जोड़ने वाली सड़कों पर मास्टर प्लान में कुछ नहीं

एक वर्ष पहले
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ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (टीओडी) एरिया में आठ लाख आबादी को बसाने की बात की जा रही है। - Dainik Bhaskar
ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (टीओडी) एरिया में आठ लाख आबादी को बसाने की बात की जा रही है।
  • मास्टर प्लान-2031 में शहर के चारों ओर सैटेलाइट टाउन डेवलप करने की बात कही गई
  • इन शहरों में रहने वाले लोग सुबह सुबह राजधानी आएंगे और शाम को लौट जाएंगे

भोपाल । मास्टर प्लान-2031 में शहर के चारों ओर सैटेलाइट टाउन डेवलप करने की बात कही गई है। यानी इन शहरों में रहने वाले लोग सुबह सुबह राजधानी आएंगे और शाम को लौट जाएंगे। एेसी स्थिति में बैरसिया रोड, विदिशा रोड, रायसेन रोड, बिलकिसगंज रोड, कोलार रोड, होशंगाबाद रोड, इंदौर रोड और नरसिंहगढ़ रोड पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ेगा। लेकिन मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में इन सड़कों की मौजूदा स्थिति और भविष्य में बढ़ने वाले यातायात के दबाव को लेकर कोई चर्चा ही नहीं की गई है। अभी होशंगाबाद रोड पर ही इतना दबाव है कि वह और दबाव झेलने की स्थिति में नहीं है। पिछले प्लान में प्रस्तावित रही समानांतर होशंगाबाद रोड के अब बनने के आसार भी नजर नहीं आते। एेसे में प्लानिंग के इस पूरे कंसेप्ट पर ही पुनर्विचार होना चाहिए। मौजूदा मास्टर प्लान 25 लाख आबादी के अनुमान के साथ बनाया गया था। माना गया था कि 2005 में आबादी 25 लाख हो जाएगी। लेकिन 2020 में भी यह 23 लाख के आसपास है। इसके बावजूद संसाधन कम पड़ रहे हैं।

लोगों से भी पूछना चाहिए कि वे टीओडी में बसना चाहते हैं या नहीं
ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (टीओडी) एरिया में आठ लाख आबादी को बसाने की बात की जा रही है। ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स (टीडीआर) और प्रीमियम एफएआर जैसे नए कंसेप्ट प्लान में लाए गए हैं। लेकिन लोगों से पूछा जाना चाहिए कि वे टीओडी एरिया में बसने के लिए राजी हैं या नहीं? टीओडी की अपनी परेशानियां हैं। इसी तरह बड़े तालाब के कैचमेंट को लेकर शहर में अलग-अलग विचार सामने आते हैं। होना यह चाहिए कि मास्टर प्लान का एक ड्राफ्ट जारी करने की बजाय दो- तीन विकल्प दिए जाना चाहिए। इन पर लोगों के सुझाव लेना चाहिए और उसके बाद अंतिम निर्णय लेना चाहिए।

प्लानिंग एरिया बढ़ना एक तरह का सरकारी अतिक्रमण
अधिक आबादी के लिहाज से प्लान बनाने के लिए आसपास के गांवों को प्लानिंग एरिया में शामिल करना एक तरह का सरकारी अतिक्रमण है। गांवों को प्लानिंग एरिया में शामिल करने से वे शहर तो हो नहीं जाते। वहां शहर जैसी सुविधाएं नहीं मिलने लगती अलबत्ता जमीन की कीमत जरूर बढ़ जाती है।

35 लाख की आबादी के लिए कहां से आएंगे संसाधन
शहर में जितना पा
नी वास्तविक रूप से लोगों के घर तक पहुंच रहा है, वह पर्याप्त नहीं है। आप किसी से भी पूछ लीजिए कि क्या वह अपनी पानी की मात्रा नई आबादी से शेयर करने के लिए तैयार है, तो जवाब ना ही मिलेगा। एेसे में 35 लाख की आबादी के लिए सीवेज नेटवर्क समेत संसाधन कहां से आएंगे, इस पर विचार होना चाहिए। - प्रदीप सक्सेना (टाउन प्लानर और रिथिंकिंग अर्बनिज्म के लेखक)
 

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