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दूसरे केमिकल समझाते हैं- एसिड के सुसाइड से कुछ नहीं होगा, लोगों को सोच बदलनी होगी

मैं एसिड हूं..., इन दिनों मैं जरा उदास रहता हूं...। मैंने सोचा तो था कि यह सोसायटी मेरा उपयोग क्लीनिंग एजेंट के रूप में...

Danik Bhaskar | Sep 11, 2018, 02:20 AM IST
मैं एसिड हूं..., इन दिनों मैं जरा उदास रहता हूं...। मैंने सोचा तो था कि यह सोसायटी मेरा उपयोग क्लीनिंग एजेंट के रूप में करेगी, मैं भी समाज में साफ-सफाई रखने का अच्छा काम करूंगा, लेकिन ये लोग तो मेरा दुरुपयोग कर रहे हैं। एसिड अटैक की ऐसी घटनाएं जिनको देखकर अब मैं भी परेशान हो गया हूं। लोग तो शायद ही कभी सुधरेंगे..., इससे तो अच्छा है कि मैं ही न रहूं..., आत्महत्या कर लूं तो शायद हजारों लड़कियों की जान बच जाएगी।

बार-बार ऐसे विचार मन में आने के कारण एसिड सोमवार को सुसाइड करने की वाला था कि उसके एलीमेंट्स सल्फर, ऑक्सीजन और हाइड्रोजन उसे रोक लेते हैं और उसे समझाते हैं कि तुम्हारे अंत से समाज में पनप रही कुंठित मानसिकता का अंत नहीं होगा। तब एसिड अपने सहयोगियों से उन घटनाओं को साझा करता है, जो समाज में घट रही हैं और जिनकी चुभन ने एसिड को दुखी कर दिया।

यह कहानी शायद उस वक्त एक सच्ची घटना होती, यदि एसिड कोई केमिकल न होकर भावनाओं से भरा व्यक्ति होता। सोमवार को शहीद भवन में मंचित नाटक एसिड अटैक की यही कहानी है। हम थिएटर ग्रुप की 71 दिवसीय नाट्य कार्यशाला के समापन अवसर पर यहां शुरू हुए दो नाट्य समारोह के पहले दिन इस नाटक का मंचन हुआ। इस नाटक के बाद एक छोटा इंटरवल रखा गया और बाद में लघु नाटक आजाद का मंचन किया गया। खास बात यह थी कि दर्शकों का मूड इंटरवल के दौरान डिस्टर्ब न हो इसके लिए इंटरवल में मनीष रायकवार और सिमरन बहल की भरतनाट्यम और निधि बर्मन की कथक की प्रस्तुति रखी गई।

लड़की के चेहरे पर फेंके जाने, तो कभी नवजात की जान लेने जैसे दुरुपयोगों से परेशान एसिड करना चाहता है सुसाइड

एसिड ने यूं बताए दिल दहला देने वाले यह किस्से

पहला किस्सा

ए क परिवार पूरी तरह पुरुष प्रधान मानसिकता से ग्रसित है। परिवार के पुरुषों को घर में वारिस आने की लालसा है। लेकिन एक के बाद एक लड़कियां जन्मती हैं। इस बार चौथी संतान भी लड़की की हुई, पिता बेटियों से निजात चाहता है और नवजात बच्ची को एसिड डालकर मार देता है।

चौथी संतान भी लड़की हुई तो डाला एसिड

ऐसे की नाटक की तैयारी: बलून से दिया एसिड के घावों का लुक

निर्देशक बालेन्द्र सिंह ने बताया, कार्यशाला के दौरान तीन दिन तक हमने सिर्फ मेकअप और लुक्स पर काम किया था। इसी दौरान हमने आर्टिस्ट को सिखाया कि कैसे पेपर नैपकिन या बलून से हम एकदम रियलिस्टिक नजर आने वाले घाव बना सकते हैं। नाटक में एसिड विक्टिम की जली हुई स्किन को गुब्बारे के टुकड़ों से बनाया गया है।

दूसरा किस्सा

कॉ लेज के बाहर मनचले कभी लड़कियों पर कमेंट्स करते हैं तो कभी छेड़छाड़। यहा सिलसिला जब हद पार कर लेता है, तो एक दिन लड़की उन लड़कों को दोबारा पीछा नहीं करने की हिदायत देती है। यह हिदायत लड़कों को ऐसी इंसल्ट लगती है कि वे लड़कियों पर एसिड फेंक देते हैं।

मनचलों ने लड़कियों के चेहरे पर डाला एसिड

तीसरा किस्सा

ए क एसिड विक्टिम अपने जख्मों से ज्यादा परेशान है लोगों और समाज के तानों से। इन तानों से तंग आकर वह विक्टिम कहती है, मैं बदसूरत नहीं हूं, बल्कि वह लोग बदसूरत हैं, जिन्होंने मुझे इस हाल में पहुंचाया। वह एसिड विक्टिम कहती है, न मैं कमजोर हूं न मैं अबला, हिम्मत वाली नारी हूं।

सुसाइड से दूर जीने की ठानती है एसिड विक्टिम