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पेटीएम के संस्थापक विजय शेखर शर्मा ने स्टूडेंट्स से शेयर की अपनी सक्सेस स्टोरी, कहा-

3 वर्ष पहले
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आप भोपाल में पढ़ते हो, यह प्रदेश की राजधानी है। मैं अलीगढ़ के हरदुआगंज में पढ़ता था, जो किसी प्रदेश की टीयर-3 सिटी में आता है। एक ऐसी जगह जहां जब किसी परिवार में शादी होती थी तो स्कूल में छुट्‌टी कर दी जाती थी। मेरी क्लास में ऐसे स्टूडेंट्स भी थे, जिनके पास हवाई चप्पल भी नहीं थीं। जब पहली बार स्कूल में गया तो मैं शॉक्ड था कि यहां के बच्चे इतने गरीब कैसे हो सकते हैं। मैंने लैक ऑफ मनी पहली बार इतने नजदीक से देखी थी। मेरी सिस्टर्स बीए-एमए की स्टूडेंट्स थीं, तो हिंदी किताबें पढ़ता था। उस दौरान मैंने चार पंक्तियां लिखीं और स्कूल मैग्जीन के लिए स्कूल टीचर को दीं, मैं आपको सुनाता हूं- मैं गरीबी हूं मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकती, क्योंकि मैं तुम्हें प्यार करती हूं, पर तुम मुझे उससे ज्यादा प्यार करते हो...। बचपन में लिखी इन्हीं लाइन्स को सुनाकर स्टूडेंट्स को मोटिवेट किया पेटीएम के सीईओ विजय शेखर शर्मा ने। वे गुरुवार को टीआईटी इंजीनियरिंग कॉलेज में \\\"हम होंगे कामयाब\\\' कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता शामिल हुए। उन्होंने सफल होने के लिए कहा- जब आप अपने एग्जिट डोर आैर अॉल्टरनेट्स खत्म कर देंगे, उस दिन आपको सफलता मिल जाएगी।

लिमिटेशन को प्रॉब्लम नहीं अपॉर्च्युनिटी बनाएं

हम लोग अपनी लिमिटेशन को एंजॉय करते हैं। जिस दिन हमने लिमिटेशन को प्रॉब्लम्स की बजाय अपॉर्च्युनिटीज में बदल लिया सारा आसमां खुल जाता है। मैं हिंदी मीडियम से पढ़ा हूं। लकी होने के कारण इंजीनियरिंग कॉलेज में एंट्री हो गई। हिंदी मीडियम से गया तो यह भी नहीं पता था कि रेजिस्टेंस को अंग्रेजी में प्रतिरोध कहते हैं। शुरुआत में तो फ्रंट बैंच पर बैठता था, लेकिन धीरे-धीरे मैं क्लास की बैक बैंच पर पहुंच गया। 1994 में वहां से निकल कर कैंटीन जाने और यायावरी गलियों में जाने की बजाय मैं कम्प्यूटर क्लास चला गया। हिंदी मीडियम का होने की वजह से जब टीचर्स वेलोसिटी, मूवमेंट्स जैसे शब्द बोलते तो अल्फाबेट हवा में उड़ते लगते थे।

कॉलेज से निकला तो खुद की कंपनी थी

धीरे-धीरे इंटरनेट को ग्रो होता हुआ देखा और मैंने खुद की एक कंपनी शुरू कर दी। जब कॉलेज से बाहर निकला तो मेरे पास खुद की एक कंपनी थी। अपने जिंदगी के पाथ को मैं क्रिएटिव और कंस्ट्रक्टिव-वे पर ले गया। यही मेरी लाइफ का टर्निंग पॉइंट था। एक बड़ी प्रॉबल्म यह है कि जब हम कोई काम शुरू करते हैं तो उसमें लगाने के लिए पैसे नहीं होते और घर की स्थिति ऐसी नहीं कि मदद ले सकें। बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं, जिन्हें ऐसी प्रॉब्लम नहीं होती है। यह वह मूवमेंट है, जहां आइडिया, इंटेंशन, सिंसेयरिटी, कमिटमेंट जैसे शब्द आपकी लाइफ में महत्वपूर्ण होते हैं। जब कॉलेज से अच्छी नौकरी मिली उसे छोड़कर मैंने इंटरनेट इंडस्ट्री में कदम रखा और कंपनी शुरू की। इंडिया की इकोनॉमी आज 2.5 ट्रिलियन डॉलर की है, जिसे बनने में 70 साल लगे। अगले सात साल में इस इकोनॉमी में 2.5 ट्रिलियन डॉलर और एड होंगे। जो हमारे पूर्वजों ने 70 सालों में बनते हुए देखा वो हम लोग अगले 7 सालों में देख लेंगे।

हजारों करोड़ का इन्वेस्टमेंट

पेटीएम में हमने अब तक 15 हजार करोड़ का इन्वेस्टमेंट किया है। हमारे देश में इतनी अपॉर्च्युनिटीज हैं कि यहां इन्वेस्ट करने के लिए विदेशों में हजारों करोड़ रुपए लेकर लोग बैठे हुए हैं। सिंसेयरिटी, हार्ड वर्क, कमिटमेंट, ऑनेस्टी, एथिक्स, गर्वनेंस वो चीजंे हैं, जो इस देश में मिसिंग हैं।

कैश फ्लो नहीं, ़्मालूम था

मेरे पास 2003-04 में मौका था कि अपनी एक टेलीकॉम कंपनी बना लूं। मेरी कंपनी में कैश फ्लो नहीं था। मैंने लोन लेकर सैलरी दी, दूसरों की पेमेंट कर दी और मेरी सारी पेमेंट आउटस्टैंडिंग होती गई। 1 लाख करोड़ वैल्यू वाली कंपनी का 40 प्रतिशत मैंने किसी को महज 8 लाख रुपए में दे दिया था, क्योंकि मुझे कैश फ्लो की जानकारी नहीं थी। उस समय ठंडी में दो कप चाय पीना मेरे लिए मुश्किल हो गया था। 2011-12 में पेटीएम शुरू करने का जब समय तब बोर्ड मेंबर्स ने कहा- देश में पेमेंट के लिए मोबाइल फोन की सोच ठीक नहीं। इस देश में लोग हाथ में नोट पकड़कर चार बार चेक करते हैं। यह नोटों पर चलने वाली इकोनॉमी है, लेकिन मेरा कमिटमेंट था और कर दिखाया।

जिस दिन आप अपने एग्जिट डोर और ऑल्टरनेट्स खत्म कर देंगे, उस दिन सफलता मिल जाएगी
Âविजय शेखर शर्मा

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