ग्राउंड रिपोर्ट / मप्र के ‘रेगिस्तान’ में दो पूर्व मुख्यमंत्रियों की प्रतिष्ठा का सवाल; एक को सीट बचानी है और दूसरे को गढ़



question of the prestige of two former Chief Ministers in the 'Desert' of MP
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question of the prestige of two former Chief Ministers in the 'Desert' of MP

  • दिग्विजय सिंह ने यहां सभा ली, बेटे और मंत्री जयवर्धन व मंत्री प्रियव्रत सिंह यहीं डटे हुए हैं
  • भाजपा की कमजोर बेल्ट पर शिवराज ताकत झोंके हुए हैं, शाह भी यहां सभा कर चुके
  • इसबार किरार और धाकड़ वोटों के बंटने से रोचक हुआ मुकाबला

Dainik Bhaskar

May 08, 2019, 06:17 AM IST

अनिल गुप्ता | राजगढ़ . राजगढ़ के बीच से गुजर रहे बायपास पर चुनावी सूनापन और बाजार में सियासी रौनक भले कम हो, लेकिन राजगढ़ संसदीय सीट का पारा जरूर चढ़ा हुआ है। इसकी वजह है, इस सीट का दो पूर्व मुख्यमंत्रियों दिग्विजय सिंह और शिवराज सिंह चौहान की प्रतिष्ठा से जुड़ा होना। दिग्विजय को अपना बरसों पुराना गढ़ बचाना है तो शिवराज को यह सीट दोबारा जीतनी है। दरअसल शिवराज के सक्रिय होने के पीछे बड़ी वजह यह है कि स्थानीय स्तर पर अच्छे खासे विरोध के बाद भी पार्टी ने शिवराज की पसंद को तवज्जो देकर मौजूदा सांसद रोडमल नागर को प्रत्याशी बनाया।

 

नागर किरार-धाकड़ समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। कांग्रेस उम्मीदवार मोना सुस्तानी भी इसी वर्ग से जुड़ी हैं। इसलिए भाजपा और कांग्रेस दोनों ने पूरी ताकत झोंक दी है। यह और बात है कि कांग्रेस की राज्य में सरकार बनने के बाद राजगढ़ के मुख्य बाजार में मोना सुस्तानी की चर्चा तेज है। ऐसा इसलिए भी कि खुद दिग्विजय उनके लिए सभा लेने आए। उनके बेटे व कैबिनेट मंत्री जयवर्धन सिंह और प्रियव्रत सिंह यहीं डटे हुए हैं। मोना स्थानीय स्तर पर चर्चित चेहरा हैं। इसीलिए शिवराज ने भी कमजोर पड़ रहे जीरापुर बेल्ट, चाचौड़ा आदि पर फोकस किया। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी राजगढ़ पहुंचे। रोडमल नागर का टिकट घोषित होने के समय जो विरोध था, भाजपा ने तकरीबन उसे भी साध लिया है। लिहाजा यहां चुनाव करीबी बनता जा रहा है। जबकि 2014 के चुनाव में भाजपा ने आजादी के बाद अब तक हुए लोकसभा चुनाव में  सर्वाधिक वोट हासिल किए थे। भाजपा को क्षेत्र में मोदी फैक्टर पर भी भरोसा है। 

 

मोना सुस्तानी भी चर्चित चेहरा, इसलिए भाजपा ने अपने बड़े नेताओं को यहां प्रचार सौंपा 

 

यहां सरनेम की जगह सुस्तानी ही लिखते हैं…कहते हैं कि मोना सुस्तानी को यह सरनेम उनके गांव से मिला। दरअसल यह परिपाटी 1972 में पूर्व विधायक गुलाब सिंह सुस्तानी ने शुरू की थी। उस समय प्रदेश सरकार में गुलाब चंद्र तामोड़ मंत्री थे। हालांकि वे धाकड़ थे, लेकिन गांव तामोड़ का नाम सरनेम में लिखते थे। गुलाबसिंह ने तामोड़ से सीखा और अपने नाम के आगे सुस्तानी लिखने लगे। यहां के आज ऐसे एक दर्जन से ज्यादा कांग्रेसी नेता हैं, जो सरनेम की जगह सुस्तानी ही लिखते हैं।

 

8 विधानसभा सीटें : पांच पर कांग्रेस, दो पर भाजपा मजबूत 

 

कांग्रेस के खाते की विधानसभा : चाचौड़ा, राघौगढ़, ब्यावरा, राजगढ़ और खिलचीपुर कांग्रेस के खाते में हैं। 2018 में कांग्रेस ने राघौगढ़ सीट छोड़कर सभी भाजपा से छीनी हैं। नरसिंहगढ़ व चाचौड़ा में भाजपा स्थानीय नाराजगी से दो-चार हुई, लेकिन अब स्थिति कुछ सुधर गई है। 
दो पर भाजपा : भाजपा ने नरसिंहगढ़ सीट कांग्रेस से 2018 में छीनी और सारंगपुर सीट बचाई। मोदी फैक्टर जिस तरह से चर्चा में है, उससे भाजपा को उम्मीद है कि कांग्रेस के प्रभाव वाली विधानसभा राघौगढ़ व चाचौड़ा में भी फायदा मिलेगा। 
एक पर निर्दलीय : सुसनेर सीट 2013 के चुनाव में भाजपा जीती थी, यह अब निर्दलीय के पास है। निर्दलीय विक्रम सिंह राणा कांग्रेस की प्रदेश सरकार को समर्थन दे रहे हैं। 

 

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मोदी फैक्टर के कारण पलायन, बेरोजगारी और सिंचाई जैसे बड़े स्थानीय मुद्दे प्रचार से गायब हैं…ब्यावरा के किसान सोहनलाल धाकड़ का कहना है कि राजगढ़ के युवा पलायन कर कोटा, विदिशा और अन्य जगहों पर जा रहे हैं। रोजगार नहीं है। मोहनपुरा सिंचाई परियोजना का उद् घाटन खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था, जिसकी नहरों का काम धीमी गति से चल रहा है। सिंचाई और पानी की व्यवस्था हो जाए तो राजगढ़ के लिए बेहतर होगा, लेकिन यह मुद्दा प्रचार में नहीं है।

 

लक्ष्मण सिंह के रुख पर नजर : राजगढ़ जिला सर्वाधिक ड्राइ एरिया कहलाता है। इसे मप्र का रेगिस्तान भी कहते हैं। यहां से 1984 में दिग्विजय जीते और 1989 में भाजपा के प्यारेलाल खंडेलवाल से हारे। फिर दिग्विजय ने खंडेलवाल को हराया और तब से 1999 तक कांग्रेस का गढ़ रही यह सीट लक्ष्मण सिंह को जिताती रही। 2004 में लक्ष्मण भाजपा में चले गए और जीते, लेकिन 2009 में फिर हार गए। अब वे कांग्रेस से विधायक हैं, लेकिन टिकट के घोषित होने के बाद से चर्चा है कि वे ज्यादा खुश नहीं हैं। प्रचार में भी कम दिख रहे हैं।

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