रमजान / तोप की आवाज सुनकर रोजेदार खोलते हैं रोजा, 200 साल पुरानी है परंपरा



रायसेन में तोप की आवाज सुनकर लोग रोजा खोलते हैं। रायसेन में तोप की आवाज सुनकर लोग रोजा खोलते हैं।
यहां 200 साल से ये परंपरा चली आ रही है। यहां 200 साल से ये परंपरा चली आ रही है।
तोप चलाने के लिए मस्जिद से सिग्नल दिया जाता है। तोप चलाने के लिए मस्जिद से सिग्नल दिया जाता है।
एक ही परिवार के सदस्य ये परंपरा निभा रहा है। एक ही परिवार के सदस्य ये परंपरा निभा रहा है।
सेहरी और अफ्तारी के समय छोड़े जाते हैं गोले। सेहरी और अफ्तारी के समय छोड़े जाते हैं गोले।
रमजान शूरू होने की सूचना तोप के गोले छोड़कर दी जाती है। रमजान शूरू होने की सूचना तोप के गोले छोड़कर दी जाती है।
ईद के एक दिन पहले और ईद के दिन भी सात-सात गोले छोड़े जाते हैं। ईद के एक दिन पहले और ईद के दिन भी सात-सात गोले छोड़े जाते हैं।
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रायसेन में तोप की आवाज सुनकर लोग रोजा खोलते हैं।रायसेन में तोप की आवाज सुनकर लोग रोजा खोलते हैं।
यहां 200 साल से ये परंपरा चली आ रही है।यहां 200 साल से ये परंपरा चली आ रही है।
तोप चलाने के लिए मस्जिद से सिग्नल दिया जाता है।तोप चलाने के लिए मस्जिद से सिग्नल दिया जाता है।
एक ही परिवार के सदस्य ये परंपरा निभा रहा है।एक ही परिवार के सदस्य ये परंपरा निभा रहा है।
सेहरी और अफ्तारी के समय छोड़े जाते हैं गोले।सेहरी और अफ्तारी के समय छोड़े जाते हैं गोले।
रमजान शूरू होने की सूचना तोप के गोले छोड़कर दी जाती है।रमजान शूरू होने की सूचना तोप के गोले छोड़कर दी जाती है।
ईद के एक दिन पहले और ईद के दिन भी सात-सात गोले छोड़े जाते हैं।ईद के एक दिन पहले और ईद के दिन भी सात-सात गोले छोड़े जाते हैं।

  • सेहरी और अफ्तारी की सूचना देने के लिए किले की पहाड़ी पर चलती है तोप 

Dainik Bhaskar

May 15, 2019, 03:35 PM IST

भोपाल. मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में रमजान के महीने में सेहरी और अफ्तारी के समय की जानकारी देने के लिए तोप चलाए जाने की परंपरा है। यह परंपरा पिछले करीब 200 साल से निभाई जा रही है। यहां आज भी मुस्लिम समाज के लोग किले की पहाडी से चलने वाली तोप की आवाज सुनकर ही रोजे खोलते हैं। नवाबी शासन काल से यह परंपरा चली आ रही है। इस तोप की गूंज करीब 30 गावों तक सुनाई देती है, जिसे सालों से एक ही परिवार चलाता आ रहा है। 

 

इस तोप को चलाने के लिए बाकायदा जिला प्रशासन द्वारा एक माह का लाइसेंस जारी किया जाता है। रमजान की समाप्ति पर ईद के बाद तोप की साफ-सफाई कर इसे सरकारी गोदाम में जमा कर दिया जाता है। तोप चलाने के लिए आधे घंटे पहले तैयारी करना पड़ती है, तब कहीं जाकर समय पर तोप चल पाती है। 

 

जगाने के लिए दो घंटे पहले बजाते हैं नगाड़े: समय की सूचना देने के लिए सेहरी से 2 घंटा पहले रोजदारों को जगाने के लिए नगाड़े बजाए जाते हैं, ताकि लोग समय से पहले तैयारी कर सकें। नगाड़े बजाने की परंपरा भी प्राचीन काल से ही चली आ रही है। शहर का वंशकार परिवार इस काम को संभाले हुए है। नगाड़े किले की प्राचीर से बजाए जाते हैं। इससे इनकी आवाज मीलों दूर तक सुनाई देती है।

 

मस्जिद से मिलता है सिग्नल: तोप चलाने से पहले दोनों टाइम टांके वाली मस्जिद से सिग्नल मिलता है। सिग्नल के रूप में मस्जिद की मीनार पर लाल रंग बल्ब जलाया जाता है। उसके बाद किले की पहाड़ी से तोप चलाई जाती है। ऐसा बताया जाता है देश में राजस्थान में तोप चलाने की परंपरा है। उसके बाद देश में मप्र का रायसेन दूसरा ऐसा शहर है, जहां पर तोप चलाकर रमजान माह में सहरी और अफ्तारी की सूचना दी जाती है।

 

खानदानी परंपरा: तोप चलाने वाले परवेज खान ने बताया कि उनके दादा काजी बरकत उल्लाह रमजान माह में तोप चलाते थे, उसके बाद उनके पिता ने तोप चलाई। फिर चाचा तोप चलाते रहे। अब वह चौथी पीढ़ी में तोप चला रहे हैं। तोप को चलाने के लिए रस्सी बम को भरने वाली बारूद का उपयोग किया जाता है। एक बार तोप चलाने के लिए 100 से 150 ग्राम बारूद का उपयोग होता है। 

 

रात के अंधेरे में सुबह 3 बजे चढ़ते हैं किले पर: सेहरी की सूचना के लिए तोप चलाने के लिए वह सुबह 3.10 बजे किले की पहाड़ी पर चढ़ते हैं। इसके बाद सुबह 3.40 मिनट पर तोप चलाकर सेहरी की जानकारी देते है। इसी प्रकार अफ्तारी के लिए शाम को पौने सात बजे किले पर पहुंचकर तोप चलाते हैं।

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