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एमपी के शिव का सफर / शिवराज रिकॉर्ड चौथी बार सीएम बने, 30 साल में सिर्फ एक चुनाव हारे, 15 महीने बाद फिर शपथ ली

2005 में भाजपा की बैठक में आडवाणी ने शिवराज को मुख्यमंत्री बनाने की सिफारिश की थी।- फाइल 2005 में भाजपा की बैठक में आडवाणी ने शिवराज को मुख्यमंत्री बनाने की सिफारिश की थी।- फाइल
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2005 में भाजपा की बैठक में आडवाणी ने शिवराज को मुख्यमंत्री बनाने की सिफारिश की थी।- फाइल2005 में भाजपा की बैठक में आडवाणी ने शिवराज को मुख्यमंत्री बनाने की सिफारिश की थी।- फाइल

  • उमा भारती के इस्तीफा देने के बाद 2005 में शिवराज पहली बार सीएम बने, उस वक्त लोकसभा सांसद थे 
  • शिवराज पहली बार 1990 में बुधनी से विधायक बने, एक साल बाद विदिशा से सांसद चुने गए, 5 पांच बार सांसद रहे
  • 2003 के विधानसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह के खिलाफ चुनाव हारे, यही उनके अब तक के करियर की पहली और आखिरी हार

दैनिक भास्कर

Mar 23, 2020, 09:10 PM IST

भोपाल. शिवराज सिंह चौहान रिकॉर्ड चौथी बार मध्य प्रदेश के मुख्ममंत्री बन गए। वे राज्य के 32वें मुख्यमंत्री हैं। इससे पहले दिसंबर 2018 तक लगातार 13 साल प्रदेश के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे। शिवराज से पहले अर्जुन सिंह और श्यामाचरण शुक्ल तीन-तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में शिवराज ने बुधनी से कांग्रेस प्रत्याशी अरुण यादव को 60 हजार वोटों से हराया था। शिवराज तो चुनाव जीत गए, लेकिन मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार बनाने में असफल रही। शिवराज के बारे में कहा जाता है कि जब वह 9 साल के थे, तब उन्होंने गांव के मजदूरों को दोगुना वेतन देने के लिए आंदोलन किया था।

ऐसे मिला था सांसद बनने मौका
बात 1991 की है। लोकसभा चुनाव में लखनऊ और विदिशा सीट से चुनाव जीतने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ को चुना था। इसके बाद शिवराज यहां से उपचुनाव लड़े और जीते। इस दौरान वे शहरी स्वर्णकार कॉलोनी में छोटा-सा मकान किराए पर लेकर रहने लगे। उनके निवास पर लोगों का आना-जाना बढ़ा तो यह मकान छोटा पड़ने लगा। बाद में विदिशा के शेरपुरा स्थित दोमंजिला भवन को किराए पर लिया। यहीं से शिवराज राजनीतिक और पारिवारिक कार्यक्रम करवाते थे।


दिग्विजय से हारे थे शिवराज 
शिवराज राजनीतिक करियर में एक बार चुनाव हारे हैं। 2003 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने शिवराज को तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ राघौगढ़ से खड़ा किया। तब उमा भारती भाजपा से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार थीं। यह चुनाव शिवराज हार गए। चौहान को भी पता था कि राघौगढ़ से दिग्विजय को हराना मुश्किल है, लेकिन उन्होंने चुनाव लड़ना स्वीकार किया। 

आडवाणी ने शिवराज को सीएम बनाने का फैसला लिया था 

2003 का विधानसभा चुनाव जीतने  के बाद 2 साल में ही परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उमा भारती के सिर्फ 8 महीने और बाबूलाल गौर के 15 महीने मुख्यमंत्री रहने के बाद शिवराज ने 29 नवंबर, 2005 को 32वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। शिवराज, उमा भारती और बाबूलाल गौर के बाद प्रदेश के तीसरे ओबीसी मुख्यमंत्री बने। इससे पहले मध्य प्रदेश के सारे मुख्यमंत्री सवर्ण रहे थे। उमा के छोटे कार्यकाल में उनके व्यक्तित्व के कारण पार्टी को कई बार असहज होना पड़ा। तिरंगा प्रकरण में उमा को इस्तीफ़ा देना पड़ा था। इसके बाद दिल्ली में बैठक हुई, इसमें लालकृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह, बाबूलाल मरांडी और नरेंद्र मोदी शामिल हुए। शिवराज के नाम पर मुहर लगी। 


शिवराज की उदार छवि काम आई 
उमा भारती को फायर ब्रांड नेता माना जाता था और उनके बारे में पार्टी के अंदर ऐसी छवि बन गई थी कि वह विवाद ज्यादा खड़ा करतीं हैं और काम कम। शिवराज उदार नेताओं में गिने जाते थे। उनके साथ कोई विवाद भी नहीं था। संगठन इसी तरह के नेता को तलाश रहा था। शिवराज की यही छवि उनके काम आई। 

विदिशा में जाने जाते 'पांव-पांव वाले भैया'
शिवराज ने खुद को हमेशा किसान का बेटा माना। जब वे पहली बार सांसद बने तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। अपने संसदीय क्षेत्र में पहचान बनाए रखने और लोगों को जोड़ने के लिए वे लगातार दौरे करते रहे। कई बार अलग-अलग मुद्दों पर पूरे संसदीय क्षेत्र की पदयात्राएं भी कीं। यही वजह है कि विदिशा संसदीय क्षेत्र में वे ‘पांव-पांव वाले भैया’ नाम से पहचाने जाने लगे।

बिजली, पानी और सड़क पर काम हुआ तो जनता में विश्वास बढ़ा
शिवराज जब मुख्यमंत्री बने, तब प्रदेश में सड़क, बिजली, पानी की हालत सबसे ज्यादा खराब थी। उन्होंने इन चीजों पर ज्यादा ध्यान दिया, जिससे जनता का विश्वास उन पर बढ़ा। इसी भरोसे के आधार पर 2008 में उन्होंने दूसरी बार सीएम पद की शपथ ली। 2013 में फिर से प्रदेश के मुखिया बने।


व्यापमं में किरकिरी, चुनाव हुए परिणामों ने चौंकाया
शिवराज के नेतृत्व में भाजपा ने 2008 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में 230 सीटों में से 143 पर जीत हासिल की। इसके बाद व्यापमं घोटाले ने शिवराज सरकार की काफी किरकिरी कराई थी, लेकिन घोटाले में तमाम आरोपों के बावजूद 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 165 सीटें जीतीं। 14 दिसंबर, 2013 को शिवराज तीसरी बार मुख्यमंत्री बने।

2018 में भाजपा हारी, वोट प्रतिशत बढ़ा
शिवराज को प्रदेश में लोग 'मामा' के नाम से पुकारते हैं। 2018 में हुए विधाानसभा में भाजपा ने शिवराज के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा। पार्टी हार गई थी, पर वोट का प्रतिशत और सीट की संख्या बहुत ज्यादा कमी नहीं आई थी। प्रदेश में आने वाले दिनों में 25 सीटों पर उपचुनाव होने हैं। 

संगीत में है गहरी रुचि
पेशे से किसान शिवराज की संगीत में ‍गहरी रुचि है। घूमना, गानें सुनना और फिल्में देखना भी उनकी पसंद में शामिल है। उन्हें बॉलीवॉल, कबड्डी और क्रिकेट पसंद है।

राजनैतिक करियर...

  • 1990 में पहली बार बुधनी से विधायक बने। कांग्रेस के हरीसिंह को 22 हजार वोटों से हराया।
  • 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 में लगातार विदिशा से सांसद निर्वाचित हुए।
  • 2005 में बुधनी से विधायक चुने गए। 2008, 2013 और 2018 में भी यहीं से निर्वाचित। 
     

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