हम 1 दिन के 150 रुपए देंगे... बस ये काम कर दो, कभी भूखे पेट सोने को मजबूर इस महिला की ऐसी चमकी किस्मत कि अमेरिका तक से आया बुलावा / हम 1 दिन के 150 रुपए देंगे... बस ये काम कर दो, कभी भूखे पेट सोने को मजबूर इस महिला की ऐसी चमकी किस्मत कि अमेरिका तक से आया बुलावा

महिला पैसे लेकर घर लौटी तो भड़क उठा पति, फिर चौकीदारी की तो पता चली सच्चाई

dainikbhaskar.com

Feb 15, 2019, 12:33 PM IST
madhya pradesh news : bhopal news : success story and stuggle of bhoori bai for pithora painting an international artist of mp

भोपाल (मध्यप्रदेश)। ये कहानी है कभी भूखे पेट सोने को मजबूर एक महिला की जो गरीब परिवार में मजदूरी करते हुए पली-बढ़ी। लेकिन उसकी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। अब ये महिला एक ख्यात चित्रकार है, जो अपनी कला को मिली पहचान के जरिए अमेरिका तक जा चुकी है। सक्सेस स्टोरी में पढ़िए इनकी स्टोरी...

मजदूरी करते-करते बन गईं चित्रकार

- मध्यप्रदेश के झाबुआ के छोटे से गांव की भील महिला भूरी बाई (46), जो मजदूरी करते-करते ख्यात चित्रकार बन गईं। रंगों की बात करते ही उनकी आंखों की चमक बढ़ जाती है।
- भूरी बाई बताती हैं कि पिता के पास थोड़ी सी जमीन थी। जब वे 10 साल की थीं, तब चाचा और बड़ी बहन के साथ गुजरात गईं। वहां एक बड़ी इमारत बन रही थी। उसी में मजदूरी करनी थी।
- ठेकेदार ने ये छोटी बच्ची कैसे काम करेगी बोलकर काम देने से मना किया तो चाचा-बड़ी बहन की सिफारिश पर आखिरकार काम मिला। जब इमारत का काम खत्म हुआ तो दोनों बहनें लकड़ी काटकर बेचने लगीं।
- वे बताती हैं कि झाबुआ से लकड़ी काटकर ट्रेन से गुजरात लेकर जातीं क्योंकि वहां कीमत ठीक मिलती थी। लौटते वक्त कभी ट्रेन मिलती तो कभी नहीं। आधी रात लौटने पर भूखे ही सो जाते। थोड़ी और बड़ी हुईं तो अक्सर पानी पीकर पेट पर कपड़ा बांधकर सो जाया करतीं।

बचपन से था पेंटिंग का शौक, पत्तियों से बनाती थी हरा रंग

- भूरी बाई बताती हैं बचपन की कुछ रंग-बिरंगी यादें भी हैं। पिता चित्र बनाते थे, उन्हें देखकर मुझे भी शौक लगा। त्योहार-ब्याह आते तो मां से लेकर पास-पड़ोस की औरतें बुलातीं, कहतीं- भूरी, दीवारें सजा दे, अल्पना उकेर दे।
- बचपन में चित्र बनाने के लिए पत्तियों से हरा रंग बनाती। कपास से सफेद रंग और मिट्‌टी के तवे की कालिख खरोंचकर काला रंग बना लेती थी। गेरू से लाल रंग और कपड़े की चिंदी से ब्रश बनाती।
- इतनी तैयारी के बाद घर की दीवारों पर पंछी, घोड़े आदि बनाती तो शादी वाला घर जगमगा जाता। ये पेंटिंग भील लोगों की 500 साल पुरानी पिथौरा कला थी।

- भूरी बाई बताती हैं कि जब वे 17 साल की थीं तभी उनकी शादी हो गई। इसके बाद वे भोपाल आईं। यहां लोग हिंदी बोलते थे तो मैं एकदम चुपचाप देखती-सुनती रहती थी। क्योंकि मुझे भीली बोली के अलावा कुछ नहीं आता था।
- उन्होंने बताया कि तब भारत भवन (भोपाल का कला केंद्र) बन रहा था। पति ने वहां मजदूरी के काम पर लगवा दिया, जिंदगी उसी ढर्रे पर चलने को तैयार थी।

इस घटना से बदली जिंदगी

- वे बताती हैं एक दोपहर सारी मजदूरी करने वाली महिलाएं खाना खा रही थीं। तभी कुर्ता-पायजामा पहले बढ़ी दाढ़ी वाला एक आदमी आया। उनका नाम जगदीश स्वामीनाथन था, जो एक नामी कलाकार और कवि थे।
- उन्होंने हम औरतों से पूछा- तुम्हारे यहां शादी-ब्याह कैसे होता है, किस देवी-देवता को मानते हो। क्या इस सबके चित्र बनाकर दिखा सकती हो। लेकिन सभी औरतों ने आपस में बात की और मना कर दिया।
- मैंने भी उनसे कहा- हम चित्र बनाएंगे तो हमारी मजदूरी का क्या होगा? तब उन्होंने पूछा- कितनी दिहाड़ी पाती हो? मैंने बताया- जी रोज के 6 रुपए। उन्होंने कहा- रोज के 150 रुपए देंगे। तब मुझे 10 दिन के 1500 रुपए मिले थे।

जब भड़क गए पति

- वे बताती हैं कि जब पैसे लेकर घर लौटी तो पति भड़क उठे। जेठ-जेठानी ने चरित्र पर कहानियां बनाईं। सब पूछने लगे ऐसा कौन सा काम कर दिया जो इतने पैसे मिले। पति ने काम के लिए बाहर जाने से मना कर दिया। खूब लड़ाई-झगड़ा होने लगा।
- एक दिन स्वामी जी ने मुझे और मेरे पति को संदेश भिजवाया। पति से कहा कि तुम आओ और भारत भवन में चौकीदारी करो। इमारत के साथ पत्नी की चौकीदारी भी कर लेना, देखना वो क्या काम करती है।
- इसके बाद पति साथ रहने लगे और फिर कभी शक नहीं किया। अब घर पर भी मैं रंग लेकर बैठ जाती तो वो घर के काम संभाल लेता था।

जब अमेरिका से आया बुलावा

- भोपाल तक तो फिर भी ठीक था लेकिन मुझे अमेरिका बुलाया गया तो पूरा घर, पास-पड़ोस भौंचक था। अपनी कला के बारे में बात करने के लिए जाना था।
- हवाई जहाज में बैठने को लेकर लोगों ने खूब डाराया। हम दिल्ली तक ट्रेन से गए जहाज में बैठने पर मैं रोने लगी। खैर, अमेरिका पहुंची, सरकार की तरफ से दो दुभाषिए मेरे साथ थे जो भील से हिंदी और अंग्रेजी करते थे।
- वे कहती हैं कि अब अपनी उम्र से ज्यादा बार हवाई जहाज में बैठ चुकी हूं। घर का एक कमरा रंगों और ब्रश से अटा पड़ा है। कांच की अलमारी में अवार्ड्स रखें हैं जिनपर अंग्रेजी में मेरा नाम लिखा है।

मिल चुके हैं ये सम्मान

- भूरी बाई की इस कला को मध्यप्रदेश सरकार की ओर से शिखर सम्मान और देवी अहिल्या सम्मान से नवाजा जा चुका है। दम तोड़ती आदिवासियों की यह कला भूरी बाई और उनके परिवार ने आज भी सहेजकर रखी है।
- उन्होंने अपने बच्चों और नाती-पोतों को भी पिथौरा पेंटिंग बनाना सिखाया है। उनके घर का हर बच्चा पिथौरा के बारे में न केवल जानता है बल्कि कपड़ों और दीवारों पर खूबसूरत चित्र भी बनाता है।

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