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लोकसभा चुनाव / ढाई साल पहले सीधी में बिना रेल लाइन के स्टेशन का उद्घाटन कर गए थे प्रभु, लेकिन ट्रेन अब तक नहीं चली



Two and a half years were inaugurated by Prbhu, but the train did not last till now
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Two and a half years were inaugurated by Prbhu, but the train did not last till now

  • रेलवे स्टेशन का मुद्दा सबसे बड़ा, कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव का परिणाम भुलाने और रीति के सामने नाराज नेताओं को मनाने की चुनौती

Dainik Bhaskar

Apr 16, 2019, 04:48 AM IST

संजय दुबे,  भोपाल . विंध्य अंचल की सीधी लोकसभा सीट पर इस बार अधूरे वादों को भुनाने और अंतर्कलह से निपटने की चुनौती भाजपा-कांग्रेस के प्रत्याशियों के सामने बनी हुई है। यहां से भाजपा ने वर्तमान सांसद रीति पाठक तो कांग्रेस ने पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को मैदान में उतारा है। सीधी में रेल लाइन तो है नहीं, लेकिन ढाई साल पहले 18 अक्टूबर 2016 को तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु यहां रेलवे स्टेशन का उद्घाटन कर गए थे, लेकिन जनता को आज तक ट्रेन नहीं मिली। सिर्फ स्टेशन का फांउडेशन स्टोन ही डला है और स्टेशन का मॉडल जल्द मिलने की उम्मीद है। यही स्थिति सिंगरौली में बनने वाले हवाई अड्डे की है। यहां 29 अप्रैल को प्रदेश के पहले चरण का मतदान होना है और सबसे बड़ा मुद्दा रेलवे स्टेशन ही है। 

 

2007 में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी, इस बार भाजपा की अंदरूनी कलह दे सकती है मौका

 

कांग्रेस ने सीधी लोकसभा सीट पर 2007 में हुए उप चुनाव में जीत दर्ज की थी। उस दौरान मानिक शाह ने जीत दर्ज की थी। उसके बाद 2009 और 2014 में यहां से भाजपा जीतती रही। वर्तमान सांसद रीति पाठक के सामने पार्टी के अंदरूनी कलह ने चुनौती खड़ी कर दी है। सिंगरौली के जिलाध्यक्ष कांतिदेव सिंह ने रीति को टिकट मिलते ही पद से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि राज्यसभा सांसद अजय प्रताप सिंह को उन्हें मनाने के लिए लगाया गया था। भाजपा का कहना है कि वे मान गए हैं, लेकिन उनकी स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हुई है। सीधी के जिलाध्यक्ष राजेश मिश्रा भी उनके खिलाफ हैं। सीधी से चार बार के विधायक केदारनाथ शुक्ला की साख कद्दावर ब्राह्मण नेता की है। वे भी रीति पाठक के टिकट मिलने से नाराज हैं।

 

ये दोनों नेता इस सीट से दावेदारी कर रहे थे। पूर्व सांसद गोविंद प्रसाद मिश्रा टिकट न मिलने से नाराज होकर पार्टी छोड़ चुके हैं। अभी रीति के साथ जो नेता हैं, उनका जनाधार कमजोर है। चाहे वह राज्यसभा सांसद अजय प्रताप सिंह हों या विंध्य विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष सुभाष सिंह। अजय प्रताप सिंह के क्षेत्र में तो पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा पोलिंग भी नहीं जीत पाई थी। इसके अलावा पूर्व विधायक विश्वामित्र पाठक सिहावल से विधानसभा टिकट चाहते थे, लेकिन उन्हें पाठक का सहयोग नहीं मिला। बाद में वे निर्दलीय चुनाव लड़े और उन्हें 29 हजार वोट मिले।  सीधी लोकसभा में तीन जिले आते हैं। इनमें शहडोल जिले की एक विधानसभा ब्यौहारी भी है।

 

यूं समझें...कांग्रेस की ताकत-कमजोरी

 

  • सीधी लोकसभा में चुरहट, सीधी, सिहावल, चितरंगी, सिंगरौली, देवसर, धोहनी और ब्यौहारी विधानसभा आती है। अजय सिंह पिछला विधानसभा चुनाव चुरहट से हार गए थे। तब कांग्रेस सिर्फ सिलावल विस में जीती थी, बाकी सातों सीटें भाजपा के पास गई थीं। सिहावल से विधायक कमलेश्वर पटेल अभी पंचायत एवं ग्रामीण मंत्री हैं। 
  • अजय चुरहट से छह बार विधायक रहे, पर पिछला चुनाव हारे। ऐसे में लोकसभा चुनाव में उन्हें सहानुभूति वोट मिल सकता है। उनके पास केंद्र सरकार द्वारा किए गए रेलवे स्टेशन के वादे और पाठक के खिलाफ उपजी कलह को भुनाने की चुनौती है। सिंह को रीवा से चुनाव लड़ रहे सिद्धार्थ तिवारी से जुड़ाव का फायदा मिल रहा है। सीधी क्षेत्र में जहां अजय की सभाएं हुईं, वहां मंच पर क्षेत्र के बड़े नेता स्व. श्रीनिवास तिवारी के फोटो लगवाए गए। 
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