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ड्राफ्ट से आगे नहीं बढ़ पाए जनता की सुरक्षा और गवाहों की गोपनीयता वाले दो अहम बिल

प्रदेश में गवाहों की गोपनीयता और जनता की सुरक्षा वाले दो अहम बिल अटक गए हैं। राज्य सरकार पब्लिक सेफ्टी बिल लाने की...

Danik Bhaskar | Sep 10, 2018, 03:17 AM IST
प्रदेश में गवाहों की गोपनीयता और जनता की सुरक्षा वाले दो अहम बिल अटक गए हैं। राज्य सरकार पब्लिक सेफ्टी बिल लाने की तैयारी कर चुकी थी, लेकिन असहमति के चलते इसे विधानसभा में पेश नहीं किया जा सका है। दूसरी ओर गवाह सुरक्षा योजना का ड्राफ्ट केंद्र ने तीन महीने पहले तैयार कर लिया था, लेकिन सभी राज्यों के सुझाव आने में देरी के कारण इसे भी लागू नहीं जा सकेगा है। अब विधानसभा चुनाव नजदीक होने से ये दोनों बिल लागू नहीं हो पाएंगे।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) देश में गवाह सुरक्षा योजना लाने की तैयारी कर चुका है। इसका दूसरा ड्राफ्ट 2 मई को जारी किया गया था, जिसमें राज्यों से सुझाव मंगवाए गए थे। इस मामले में गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह और डीजीपी ऋषि कुमार शुक्ला के बीच बैठक हो चुकी है। राज्य सरकार ने ड्राफ्ट का अध्ययन कर सुझाव नालसा को भेज दिए हैं। ऐसे 10 लाख से ज्यादा मामले हैं, जो फिलहाल कोर्ट में पेंडिंग हैं।

पब्लिक सेफ्टी बिल : मंत्रियों की सहमति के बाद अफसरों ने अटकाया

राज्य सरकार ने जनता की सुरक्षा से जुड़े मामलों में मध्यप्रदेश जन सुरक्षा विनियमन विधेयक (एमपी पब्लिक सिक्योरिटी सेफ्टी (रेगुलेशन) बिल लाना तय किया था। बिल के आने से जनसुरक्षा के मसलों में पुलिस के अधिकार काफी बढ़ जाते। बिल को गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह, राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता और चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री शरद जैन की कमेटी सहमति दे चुकी है। इसे विधानसभा में पेश किया जाना था, लेकिन गृह विभाग में अफसरों ने इसके कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर एतराज जता दिया। करीब छह महीने बाद अब तक ड्राफ्ट पर फैसला नहीं लिया जा सका है। अब विधानसभा चुनाव की वजह से सत्र नहीं होगा और यह बिल अधर में ही लटका रहेगा। वैसे इस बिल का पूर्व आईएएस निर्मला बुच भी विरोध कर चुकी हैं।

क्यों पड़ी योजना की जरूरत

देश के चर्चित आसाराम मामले में सुनवाई के दौरान गवाहों की सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा था कि गवाहों की सुरक्षा का मसौदा तैयार किया जाए। आसाराम मामले में गवाहों की मृत्यु और धमकियों के चलते ये मुद्दा उठा था। कोर्ट ने संवेदनशील मामलों में गवाह की सुरक्षा पर कार्यक्रम बनाने के लिए अगस्त तक की मोहलत दी थी।

कुछ अड़चनों की वजह से बिल को विधानसभा में पेश नहीं किया जा सका


इस एक्ट की जरूरत इसलिए

पुलिस के अधिकार बढ़ने से अपराधियों पर सीधे लगाम कसी जा सकती थी। पुलिस के पास शांति भंग, जिलाबदर, रासुका और कई मामलों में प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करने जैसे अधिकार मिल सकते थे। अभी जिला प्रशासन के पास ही प्रतिबंधित और जेल भेजने के अधिकार हैं। इसमें समय ज्यादा लगता था। आंध्रप्रदेश में यही बिल लागू है।