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ऑफिस के बाद काम के बारे में नहीं सोचना चाहिए

जब आप गहरे तनाव में होते हैं तो हर बात पर गुस्सा आता है। शोध बताते हैं कि तनाव में गुस्सा आना स्वाभाविक हो जाता है।...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 04, 2018, 07:30 AM IST

जब आप गहरे तनाव में होते हैं तो हर बात पर गुस्सा आता है। शोध बताते हैं कि तनाव में गुस्सा आना स्वाभाविक हो जाता है। लेकिन इस गुस्से को अपने आसपास वालों पर निकालने से जरूर बचना चाहिए, चाहे वो आपका असिस्टेंट हो या परिवार का कोई सदस्य। खुद के तनाव से परेशान होकर उन्हें तकलीफ देना आपके आपसी रिश्तों में दरार पैदा कर सकता है। हो सकता है जिन बातों से आपको तनाव हो रहा है, वे आपके नियंत्रण में ही न हों लेकिन साथ में जो लोग हैं उनसे कैसा बरताव करना है, ये तो आपके नियंत्रण में है। अगली बार जब आप तनाव में हों औैर किसी पर चिल्लाने का दिल करे तो एक लंबी सांस लें और याद रखें कि अपना गुस्सा दूसरों पर नहीं निकालना है। अपने परिवार और दोस्तों को सहयोगी की तरह ही देखना चाहिए।

(स्रोत: द बेटर यू नो यु्अरसेल्फ, द मोर रेजिलिएंट यू विल बी, रॉन करूकी)

ऑफिस से बाहर हैं तो काम से तुरंत हटाएं ध्यान

हम सभी ये अच्छी तरह जानते हैं कि ऑफिस में लगातार प्रोडक्टिव बने रहने के लिए बीच में समय निकालकर खुद को रिचार्ज करने की भी जरूरत होती है। लेकिन ये असान नहीं होता है। अगर सही समय पर घर चले जाते हैं, तो भी कई बार आप या तो ईमेल चेक करने लगते हैं या कोई आखरी रिपोर्ट पढ़ने में लग जाते हैं। काम से ध्यान हटाने के लिए ये सोचना शुरू करें कि आज आप क्या करेंगे। दरअसल क्या नहीं करना है, ये सोचने से ज्यादा आसान व असरदार होता है, जो करना है, उसके बारे में सोचना। जैसे, शाम को अ़ॉफिस के पास ही कोई जिम जॉइन किया जा सकता है, वीकेंड्स पर चैरिटी करने के बारे में सोचा जा सकता है या बच्चों को स्कूल से घर लाया जा सकता है। इन गतिविधियों के दौरान भी अगर ध्यान काम की तरफ ही जाए तो दोबारा ध्यान हटाने का प्रयास शुरू किया जा सकता है।

(स्रोत: हाउ टू फॉरगेट अबाउट वर्क व्हेन यू आर नॉट वर्किंग, आर्ट मार्कमैन)

समस्या के साथ उसका हल बताना भी है जरूरी

बहुत से लीडर्स को ये कहते सुना गया है कि उन्हें समस्याएं नहीं, हल बताए जाएं। ऐसा वो इसलिए कहते हैं कि उन्हें लगता है कर्मचारी उन्हें केवल काम संबंधी समस्याएं ही न बताते रह जाएं। इसका ये मतलब भी हो सकता है कि कर्मचारियों को अपनी समस्याएं लेकर तब तक अपने मैनेजर के सामने नहींं जाना चाहिए, जब तक उनके पास उस समस्या का कोई हल न हो। सही तो ये होगा कि मैनेजर अपनी टीम से प्रॉब्लम-स्टेटमेंट लाने के लिए कहें। शिकायतों में अक्सर 'हमेशा', 'कभी नहीं' जैसे शब्दों का उपयोग होता है। शिकायत करते हुए हम अक्सर किसी दूसरे पर ही अंगुली उठाते हैं। जबकि प्रॉब्लम-स्टेटमेंट में तथ्यों पर बात की जाती है व इसमें सभी का काम साफ जाहिर होता है। किसी भी समस्या को विस्तार से जानना और समझाना, शिकायत दर्ज करने से कहीं ज्यादा आसान होता है।

(स्रोत: द प्रॉब्लम विद सेइंग डोन्ट ब्रिंग मी प्रॉब्लम्स, ब्रिंग मी सॉल्यूशन्स, सबीना नवाज)

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